Monday, February 4, 2013


क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है ?

लेख : अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)
जीवन में कभी-कभी अतीत की गहराई में झांकना बड़ा ही अच्छा लगता है और सुखप्रद भी। ।भारत के एक राज्य कश्मीर से चुन-चुन कर ‘हिन्दुओं’ को खदेड़ दिया गया था। यह राष्ट्र का बहुसंख्‍यक समाज है, यह अपने अभिन्न अंग में नहीं रह सकता। इनकी रक्षा का प्रबंध यह सरकार नहीं कर सकी क्‍योंकि सारी की सारी सरकारें ‘धर्मनिरपेक्ष’ हैं और पंडितों के लिए न्याय मांगने वाले साम्‍प्रदायिक करार दिए जाते रहे।
अगर सच कहना बगावत है तो समझो हम भी बागी हैं। इस सम्‍पादकीय में मैं बहुत सारे सवाल उठाऊंगा। इतिहास के कुछ पन्नों का सहारा लेकर अपनी बात को स्पष्ट करूंगा कि इस हिन्दुस्तान में हिन्दुओं से कैसा व्यवहार होता रहा है। सिर्फ आज वोट बैंक की राजनीति की जा रही है। वोटों की खातिर अल्पसंख्‍यकों के तुष्टीकरण की नीतियां जारी हैं। आज मनमोहन सरकार कठघरे में खड़ी है और इतिहास का काल पुरुष सरकार से पूछता है- क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?
इस सवाल का जवाब अधिकांश लोग हां में देते हैं। आखिर ऐसी सोच क्‍यों पैदा हुई? जो नई नस्लें हैं, उन्हें क्‍या मालूम कि हम क्‍या चीज हैं। भारत आजाद हुआ, इसके लिए बाकायदा इंडियन इंडीपैंडैंस एक्‍ट बना, पाकिस्तान वजूद में आ गया। अंग्रेजों ने उन्हें कश्मीर नहीं दिया था। उसे हमारे साथ महाराजा हरि सिंह ने विलय किया था। उसके बाद जब पाकिस्तान ने आक्रमण किया तब श्रीनगर तो बच गया, परन्तु हमारा 2/5 भाग पाकिस्तान ने जबरदस्ती हथिया लिया। छह घंटे के अन्दर हमारा भूभाग वापस आ सकता था, परन्तु सेना का नियंत्रण और उसे आगे बढऩे का अधिकार केवल शेख अब्‍दुल्ला  के हाथ में विशेष आदेश के द्वारा नेहरू ने दे रखा था। कारण था- हमारी धर्मनिरपेक्षता। सवाल भारतीयता का नहीं धर्मनिरपेक्षता का था। महाराजा हरि सिंह रोते रहे, हमने अपना भू-भाग गंवा दिया और मामला संयुक्त राष्ट्र तक जा पहुंचा। जब पंडित नेहरू पर दबाव पड़ा तो उन्होंने मगरमच्छी आंसुओं से भरा एक भाषण लोकसभा में 5 मार्च, 1963 को दिया था। 1965 में पाकिस्तान ने हम पर आक्रमण कर दिया। तब तक लाल बहादुर शास्त्री की कृपा से हम में बड़ा गुणात्मक फर्क आ गया था। हमने पाकिस्तान को दिन में तारे दिखवा दिए | हमारी सेनाएं लाहौर तक जा पहुंचीं | हमने ताशकंद में समझौता किया,उनका सारा भूभाग छोड़ दिया, उन्होंने कच्छ में आज तक हमारी जमीन न छोड़ी। क्‍यों? हमने धर्मनिरपेक्ष तरीके से इसका प्रौटेस्ट किया। हम चाहते तो शिमला समझौता में अपना कश्मीर वापस ले सकते थे, पर इंदिरा जी की धर्मनिरपेक्षता आड़े आ गई। तब से लेकर आज तक कश्मीर जल रहा है। हमें इस बात का मलाल नहीं कि 3 लाख हिन्दू क्‍यों निकाल दिए गए। हमें यह मलाल नहीं कि बौद्धों के साथ क्‍या हो रहा है | इस देश में हमेशा षड्यंत्र के तहत हिन्दुओं की आस्था पर करारी चोट की जाती रही है। हिन्दुओं के आस्था स्थलों की पहचान और हिन्दुओं के आराध्य देवों का अपमान किया जाता रहा है। प्रफुल्ल बिदवई जैसे लेखकों ने अपने आलेख Fight Hindutva Head on में Poisonous Hindutva का इस्तेमाल किया था यानी जहरीला हिन्दुत्व। मैंने एक बार नहीं अनेक बार लिखा है कि उन्माद की हिन्दुत्व में कोई जगह नहीं। लाखों वर्ष की कालजयी विरासत पर कलंक मत लगाओ। किसी भी लेखक ने ‘जहरीला इस्लाम’ कभी नहीं लिखा, ऐसे में कुछ उन्मादियों को जहरीला हिन्दुत्व कहने की अनुमति कैसे दी जा सकती है। देश बहुत खतरनाक दौर से गुजर रहा है। अगर जल्द सही दिशा में सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो राजनीतिक पार्टियां वोट के लालच में सामाजिक ढांचे की जड़ों में इतना जहर घोल देंगी कि सभ्‍य व धर्मनिरपेक्ष नागरिकों के लिए जीना मुश्किल हो जाएगा। देश के स्वतंत्र होने के बाद यह आवश्यक था कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू की जाए। संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया था कि सरकार को प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करनी चाहिए, लेकिन जब भी कभी समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रश्‍न खड़ा होता है मुस्लिम और ईसाई वोटों के लालची कांग्रेस व अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल स्वर में स्वर मिला कर इसका विरोध करना शुरू कर देते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बाद देश में ही नहीं देश के बाहर भी यह संदेश भेजने की प्रक्रिया का सूत्रपात किया गया कि अटल जी की सरकार एक साम्‍प्रदायिक किस्म की सरकार थी, अब यहां धर्मनिरपेक्ष सरकार का वर्चस्व हो चुका है। एक हिन्दू कलमा पढक़र मुसलमान बन जाता है या एक मुसलमान मंत्र पढक़र हिन्दू बन जाता है। यह भरोसा, विश्वास और आस्था एवं तर्क का विषय है। किसी के द्वारा पंथ का घटिया दुरुपयोग तुरन्त रोका जाना चाहिए, मतान्तरण सुविधा के लिए नहीं होना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता, देश की एकता, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक सौहार्द की दुहाई राजनीतिक दल और उनके नेता दे रहे हैं, मुझे लगता है कि उन्हें धर्म, देश, राष्ट्र की न तो जानकारी है और न ही चिंता। कांग्रेस, कम्‍युनिस्टों, तीसरे और चौथे मोर्चे के नेता और अनेक क्षेत्रीय नेता ऐसा कर रहे हैं। आजादी के बाद से ही मजहबी संकीर्णता, जातिवाद और क्षेत्रवाद जितना इन्होंने फैलाया है उतना किसी ने नहीं फैलाया। अल्पसंख्‍यकों के वोट थोक में बटोरने के लिए बहुसंख्‍यक हिन्दुओं की आस्थाओं पर लगातार आघात करना और राष्ट्रीय अस्मिता पर प्रहार करना इनकी आदत बन चुका है। जो कुछ आज हो रहा है उसकी शुरूआत अंग्रेजों के शासनकाल में हुई थी
यह एक ‘धर्मनिरपेक्ष और ढोंगी’ प्रधानमंत्री की तकरीर थी। रो रहे थे कि हम क्‍या करें, अभी समय विपरीत है, हमने अपना ‘प्रोटैस्ट’ कर दिया है। कांग्रेसी बंधु इसे पढ़ें और अपना सिर पीटें।
नेहरू रोते क्‍यों न? 1962 के युद्ध में उन्होंने हमारी दुर्गति करवा दी। चीन के नाम से रूह कांप रही थी। इसकी सारी दास्तां तब ले. जनरल वी.एम. कौल ने अपनी किताब “Untold Story” में बयान कर दी। उसे भी आज पढ़ा जाना चाहिए लेकिन किसे फिक्र है जो इन दस्तावेजों में जाए? नेहरू का 1964 में निधन हो गया।
1971 में फिर वही तारीख दुहराई गई।
हम चाहते तो शिमला समझौता में अपना कश्मीर वापस ले सकते थे, पर इंदिरा जी की धर्मनिरपेक्षता आड़े आ गई। तब से लेकर आज तक कश्मीर जल रहा है। आज एक धर्मनिरपेक्ष सरकार हमारे देश में वजूद में आ गई है लेकिन इन 30-32 वर्षों में कश्मीर में क्‍या हुआ इसका हाल सुनें। कश्मीर घाटी से 2.14 गुना क्षेत्रफल जम्‍मू का है। कश्मीर घाटी से 4.35 गुना क्षेत्रफल लद्दाख का है। उस राज्य की 90 प्रतिशत आय जम्‍मू और लद्दाख से है। 10 प्रतिशत घाटी से है। सम्‍पूर्ण आय का 90 प्रतिशत हिस्सा घाटी में खर्च किया जाता है। कारण क्‍या है? हमें इस बात का मलाल नहीं कि 3 लाख हिन्दू क्‍यों निकाल दिए गए। हमें यह मलाल नहीं कि बौद्धों के साथ क्‍या हो रहा है। पर हमें इस बात की सबसे ज्यादा फिक्र है कि-
· वहां दो नागरिकताएं कायम रहें।
· अनुच्छेद 370 कभी न हटे।
· भारत का संविधान लागू न हो।
· वहां कोई जमीन न खरीद सके।
· भारत का कानून लागू न हो।
· वहां की बेटी भारत में कहीं शादी करे तो नागरिकता खो बैठे, और पाकिस्तान में करे तो वह यहां का नागरिक हो जाए।
जम्‍मू-कश्मीर की स्वायत्तता प्रस्ताव हमारी सरकार के पास है। अगर हमारी सरकार की धर्मनिरपेक्षता ने फिर जोर मारा, तो हम सिर्फ ‘अभिन्न अंग’ रह जाएंगे, और हमारा प्यारा कश्मीर De-Facto पाकिस्तान हो जाएगा और हमारे पास De-Jure कश्मीर ही रहेगा। हम तब इस अभिन्न अंग को गाएंगे, गुनगुनाएंगे, ओढ़ेंगे, बिछाएंगे और चरखे के गुण गाएंगे। जय बापू की-जय गांधी की।
अफसोस! एक अरब 25 लाख लोगों का यह मुल्क इतना मोहताज हो गया कि प्राचीन गौरव और परम्‍पराएं भूल गया। धिक्कार है इस राष्ट्र के धरती पुत्रों पर।
मानसिक रूप से इस राष्ट्र को ‘निर्णायक जंग’ के लिए तैयार करना होगा।
”जब किसी जाति का अहं चोट खाता है।पावक प्रचंड होकर, बाहर आता है।यह वही चोट खाए स्वदेश का बल है।आहत भुजंग है, सुलगा हुआ अनल है।
इस देश में हमेशा षड्यंत्र के तहत हिन्दुओं की आस्था पर करारी चोट की जाती रही है। हिन्दुओं के आस्था स्थलों की पहचान और हिन्दुओं के आराध्य देवों का अपमान किया जाता रहा है। पहले तो अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में इतिहास से छेड़छाड़ की और हिन्दुओं को पिछड़े, भ्रष्ट, कायर और दकियानूसी, पाखंडी तथा जातिवादी सिद्ध करने का प्रयास किया। मुस्लिम आक्रांताओं के काले कारनामों पर पर्दा डाला गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी कांग्रेस के अनेक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं और वामपंथियों ने इतिहास को विकृत करने का प्रयास किया।
श्रीमती इंदिरा गांधी ने वामपंथी विचारधारा के डा. नुरुल हसन को केन्द्रीय शिक्षा राज्य मंत्री का पद सौंपा। डा. हसन ने तुरन्त इतिहास तथा पाठ्य पुस्तकों के विकृतिकरण का काम शुरू किया। वामपंथी इतिहासकारों और लेखकों को एकत्रित कर इस काम को अंजाम देना शुरू किया।
भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का गठन किया गया और पाठ्य पुस्तकों में हिन्दुओं के बारे में अनर्गल बातें लिखी गईं। गोरक्षा के लिए भारतीयों ने अनेक बलिदान दिए। इसके बावजूद छात्रों को यह पढ़ाया गया कि आर्य गोमांस का भक्षण करते थे। हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान देने वाले गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान को भ्रामक ढंग से वर्णित किया गया। प्रो. सतीश चन्द्र द्वारा लिखित एनसीईआरटी की कक्षा 11वीं की पुस्तक ‘मध्यकालीन भारत’ में लिखा गया-
”गुरु तेग बहादुर ने असम से लौटने के बाद शेख अहमद सरहिन्द के एक अनुयायी हाफिज आमिद से मिलकर पूरे पंजाब प्रदेश में लूटमार मचा रखी थी और सारे प्रांत को उजाड़ दिया था।”
”गुरु को फांसी उनके परिवार के कुछ लोगों की साजिश का नतीजा थी, जिसमें और लोग भी शामिल थे, जो गुरु के उत्तराधिकार के विरुद्ध थे। किन्तु यह भी कहा जाता है कि औरंगजेब गुरु तेग बहादुर से इसलिए नाराज था, क्‍योंकि उन्होंने कुछ मुसलमानों को सिख बना लिया था।”
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर गुरु तेग बहादुर जैसी दिव्य विभूति को लुटेरा बताना और औरंगजेब के अत्याचारों की घटना पर पर्दा डालने का प्रयास करना अक्षम्‍य अपराध ही है। छद्म धर्म निरपेक्षता के ठेकेदारों ने हिन्दू समाज की गलत तस्वीर पेश की। जब केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी ने पाठ्य पुस्तकों से गुरु तेग बहादुर, भगवान महावीर और अन्य महापुरुषों पर आरोप लगाने वाले अंश हटवाने का प्रयास किया तो धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने बवाल मचाना शुरू कर दिया और आरोप लगाया गया कि भाजपा सरकार शिक्षा का भगवाकरण कर रही है।
इस बवाल के बीच कट्टरपंथी कभी सरस्वती वंदना को इस्लाम विरोधी बताकर स्कूलों का बहिष्कार करते रहे तो कभी वे अपने बच्चों को ‘ग’ से गणेश पढ़ाने की बजाय ‘ग’ से गधा पढ़ाने की सीख देते रहे। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह जी और वीर सावरकर आदि के प्रेरक जीवन चरित्रों से छात्रों को वंचित किया जाता रहा। प्रफुल्ल बिदवई जैसे लेखकों ने अपने आलेख Fight Hindutva Head on में Poisonous Hindutva का इस्तेमाल किया था यानी जहरीला हिन्दुत्व। मैंने तब भी सवाल किया था-
उन्माद और नृशंसता की राजनीति की झीनी चादर देकर किसने ऐसा बना दिया कि भारत में हिन्दुत्व को जहरीला कहा जा रहा है?
तथाकथित कुछ अंग्रेजीदां बुद्धिजीवियों ने इस राष्ट्र के हिन्दुत्व को घृणा, विद्वेष, क्रूरता का पर्याय न केवल स्वीकार किया बल्कि बार-बार ऐसा लिखा भी
मैंने एक बार नहीं अनेक बार लिखा है कि उन्माद की हिन्दुत्व में कोई जगह नहीं। उन्माद की भाषा मत बोलो, लाखों वर्ष की कालजयी विरासत पर कलंक मत लगाओ। मैंने बार-बार इस बात को दोहराया कि चाहे हिन्दू का जुनून हो चाहे मुस्लिम का जुनून हो, जब भी मारे जाते हैं निर्दोष ही मारे जाते हैं, जो गलत है। इस्लामी आतंकवाद पर भी मेरा यही कहना है कि प्रेम और करुणा के मार्ग पर चलने वाले इस्लाम के अनुयायियों को यह शोभा नहीं देता। किसी भी लेखक ने ‘जहरीला इस्लाम’ कभी नहीं लिखा, ऐसे में कुछ उन्मादियों को जहरीला हिन्दुत्व कहने की अनुमति कैसे दी जा सकती है। वह अपने भीतर झांकें और खुद का विश्लेषण करें।
मैं छद्म बुद्धिजीवियों से कहना चाहूंगा कि हिन्दुत्व को समझना है तो वेद की ऋचाओं से समझें, उपनिषदों के मंत्रों में झांक कर देखें, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के पावन चरित्र से जानें, श्रीकृष्ण की गीता में इस दर्शन को पहचानें, शिवाजी और बंदा बहादुर का चरित्र पढ़ें, लेकिन अफसोस इस राष्ट्र में भगवान राम को भी अपमानित किया गया। भारत और श्रीलंका को जोडऩे वाले पुल श्रीराम सेतु को तोडऩे का प्रयास किया गया और हद तो तब हो गई जब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम के अस्तित्व को ही नकारने जैसी जघन्य राजनीति शुरू कर दी। जब प्रबल विरोध हुआ तो सरकार को हलफनामा वापस लेना पड़ा। दिल्ली विश्वविद्यालय की पाठ्य पुस्तकों में भी भगवान राम के बारे में अनर्गल टिप्पणियां की गईं जो हिन्दू समाज के लिए असहनीय हैं।
शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति ने देश के उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दाखिल की थी जिसमें यह निवेदन किया गया था कि बी.ए. (आनर्स) इतिहास के द्वितीय वर्ष में एक निबंध पढ़ाया जा रहा है जिसका शीर्षक है ‘थ्री हण्ड्रेड रामायणा वीथ फाइव एक्‍जाम्‍पल’। निबंध के लेखक हैं ए.के. रामानुजन। इस निबंध में रामायण के सम्‍मानित चरित्रों जैसे राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, अहिल्या आदि के विषय में अत्यंत आपत्तिजनक टिप्पणी की गई है। इसी निबंध में अन्य सामग्री के अतिरिक्त निम्रलिखित बातें पढ़ाई जा रही थीं-
· रावण और मंदोदरी की कोई संतान नहीं थी। दोनों ने शिवजी की पूजा की। शिवजी ने उन्हें आम खाने को दिया। गलती से सारा आम रावण ने खा लिया और उसे गर्भ ठहर गया। दु:ख से बेचैन रावण ने छींक मारी और सीता का जन्म हुआ। सीता रावण की पुत्री थी। उसने उसे जनकपुरी के खेत में त्याग दिया।
· हनुमान छुटभैया एक छोटा सा बंदर था एवं कामुक व्यक्ति था। वह लंका के शयनकक्षों में स्त्रियों और पुरुषों को आमोद-प्रमोद करते बेशर्मी से देखता फिरता था।
· रावण का वध राम से नहीं लक्ष्मण से हुआ।
· रावण और लक्ष्मण ने सीता के साथ व्यभिचार किया।
· माता अहिल्या को यौन की एक मूर्ति बताया गया है, जिसका इन्द्र के साथ लज्जापूर्ण ढंग से यौन व्यभिचार दर्शाया गया है।
ए.के. रामानुजन द्वारा लिखित निबंध ‘थ्री हण्ड्रेड रामायणा’ एक पुस्तक में सम्मिलित था जिसका नाम था ‘मैनी रामायण।’ यह पुस्तक पौला रिचमेन (आक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी) द्वारा सम्‍पादित की गई थी। सम्‍पादक ने अपनी पुस्तक में पुस्तक के उद्देश्य स्पष्ट किए थे। उनका कहना था कि यह पुस्तक रामानंद सागर द्वारा प्रदर्शित ‘रामायण’ टी.वी. सीरियल के अत्यधिक सकारात्मक प्रभाव को निरस्त करने के लिए लिखी गई है।
शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति ने सन् २००८ में पुस्तक के प्रकाशक आक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रैस, लंदन से सम्‍पर्क किया तथा निबंध के विषय में अपनी आपत्तिा बताई और कहा कि पुस्तक में हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया गया है। आक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने खेद प्रकट किया, माफी मांगी तथा आश्वासन दिया कि उनका उद्देश्य हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। उन्होंने पुस्तक को वापस लेना स्वीकार किया। इसकी सूचना उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग तथा दिल्ली विश्वविद्यालय को भी दी किन्तु इतिहास विभाग ने इसका संज्ञान नहीं लिया तथा अनधिकृत रूप से निबंध को अपने पाठ्यक्रम में पढ़ाना जारी रखा।
समिति ने न्यायालय से प्रार्थना की थी कि इस निबंध को पाठ्यक्रम से हटा दिया जाए। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इस संबंध में कुछ विद्वानों की राय ली जाए। विद्वानों की राय विश्वविद्यालय की एकेडेमिक कौंसिल के सामने प्रस्तुत की जाए। कौंसिल के निर्णय के अनुसार उपकुलपति अग्रिम कार्यवाही करें। दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने न्यायालय के आदेश के अनुसार कार्यवाही करके पूरे तथ्य एकेडेमिक कौंसिल की बैठक में प्रस्तुत किए। सदस्यों ने भी अपने-अपने विचार व्यक्त किए। कौंसिल ने इन विचारों का गम्‍भीरता से अध्ययन किया। कौंसिल के समक्ष यह तथ्य भी लाया गया कि उक्त निबंध केवल 2001 तक के लिए पाठ्यक्रम के लिए स्वीकृत था और सन् 2009 के पश्चात् उसे अनधिकृत रूप से पढ़ाया जाता रहा है। विषय के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद एकेडेमिक कौंसिल ने विवादित निबंध को पाठ्यक्रम से हटाने का निर्णय लिया।
प्रख्‍यात विद्वान हृदय नारायण दीक्षित लिखते हैं कि जीवंत इतिहास बोध में ही राष्ट्र का अमरत्व है और विकृत इतिहास में राष्ट्र की मृत्यु। श्रीराम भारत के मन का रस और छंद हैं। रामानुजन के विवादित निबंध को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग हिन्दू धर्म के खिलाफ कुत्सित षड्यंत्र है।
इतने वर्षों से बच्चों को इतिहास की कक्षा में अश्लील कथा पढ़ाई जाती रही और भगवान राम का अपमान किया जाता रहा, हिन्दुओं की सहनशीलता को दाद तो देनी ही पड़ेगी।
देश बहुत खतरनाक दौर से गुजर रहा है। अगर जल्द सही दिशा में सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो राजनीतिक पार्टियां वोट के लालच में सामाजिक ढांचे की जड़ों में इतना जहर घोल देंगी कि सभ्‍य व धर्मनिरपेक्ष नागरिकों के लिए जीना मुश्किल हो जाएगा। देश के स्वतंत्र होने के बाद यह आवश्यक था कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू की जाए। संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया था कि सरकार को प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करनी चाहिए, लेकिन जब भी कभी समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रश्‍न खड़ा होता है मुस्लिम और ईसाई वोटों के लालची कांग्रेस व अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल स्वर में स्वर मिला कर इसका विरोध करना शुरू कर देते हैं।

13 जुलाई, 2003 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले में निर्णय देते हुए कहा था कि यह अत्यंत दु:ख की बात है कि स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद भी संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत आने वाले अनुच्छेद 44 पर अमल नहीं हो सका। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए संसद को कानून बनाना चाहिए क्‍योंकि इससे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट का यह महत्वपूर्ण निर्णय आते ही आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कट्टरपंथियों ने शोर-शराबा मचाना शुरू कर दिया। सबसे ज्यादा शर्मनाक बात यह थी कि कांग्रेस और कम्‍युनिस्ट पार्टियों और अन्य दलों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विरोध किया।

भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनका उल्लेख होते ही राजनीतिक क्षेत्र में भूचाल आ जाता है। देश के लिए चाहे वे कितने ही अधिक महत्वपूर्ण हों परन्तु राजनीतिक क्षेत्र के लोग अपने सत्ता स्वार्थ के कारण उनकी निरंतर उपेक्षा करते आ रहे हैं। उन्हीं में से एक मुद्दा है समान नागरिक संहिता का, जिसका नाम लेना भी भारतीय राजनीति में अपराध समझा जाने लगा है परन्तु भारतीय संविधान एवं न्यायपालिका समान नागरिक संहिता को देश की एकता एवं अखंडता के लिए आवश्यक समझती है। ऐसी परिस्थिति में जब संवैधानिक उत्तरदायित्व एवं न्यायालय का निर्णय राजनीतिज्ञों की दृष्टि में अपराध बन जाए तब देश के नागरिकों को इसके विषय में जानना एवं निर्णय लेना अनिवार्य हो जाता है। अत: इस दृष्टि से निम्‍न बिन्दुओं पर विचार करना आवश्यक है।

दुनिया के किसी भी अन्य देश में दोहरी कानून व्यवस्था नहीं तथा भारत के अतिरिक्त किसी भी दूसरे देश के नागरिकों के लिए अलग-अलग कानून का विधान भी नहीं। यूरोप एवं अमरीका समेत सभी पश्चिमी राष्ट्रों में वहां रहने वाले नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता है। वहां पंथ, जाति या क्षेत्र के आधार पर किसी विशेष कानून का विधान नहीं किया गया। दूसरी तरफ अरब के उन मुस्लिम राष्ट्रों में भी अलग कानून की व्यवस्था नहीं है जहां शरीयत एवं कुरान के कानून मान्य हैं। वहां के अन्य धर्मावलम्बियों के ऊपर भी वही कानून लागू होते हैं। एकमात्र भारत ही ऐसा राष्ट्र है जहां मुस्लिम मतावलम्बियों के लिए नागरिक कानून से अलग शरीयत कानून लागू होता है। उन पर भारत की संसद के द्वारा बनाए गए कानून लागू नहीं होते। दूसरी तरफ सनातनी हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा सिखों पर संसद द्वारा बनाई गई एक समान नागरिक संहिता लागू होती है, जिसे हिन्दू लॉ कहते हैं। एक ही क्षेत्र में रहने वाले एक ही शासन द्वारा शासित नागरिकों पर भिन्न-भिन्न कानून के लागू होने का यह अद्भुत उदाहरण केवल भारत में ही मिलता है
भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ का काफी दुरुपयोग होता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में चार विवाह की छूट एवं तलाक लेने की सरल प्रक्रिया के कारण मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव एवं अत्याचार तो होते ही हैं, अन्य धर्मों के लोग भी दूसरी शादी के लिए इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेते हैं। भारत में अल्पसंख्‍यकों को अनेक प्रकार की सुविधाएं दी जाती हैं। अल्पसंख्‍यकों को अपने धार्मिक शिक्षण संस्थान चलाने की छूट है और सरकार इन शिक्षण संस्थानों को करोड़ों रुपए का अनुदान भी देती है।

बदलती दुनिया और महिला अधिकारिता के प्रति जन जागृति आने के बाद कई मुस्लिम देशों ने अपने कानूनों में सुधार किया है। सीरिया, मिस्र, तुर्की, मोरक्को और ईरान में भी एक से अधिक विवाह प्रतिबंधित हैं। ईरान, दक्षिण यमन और कई देशों में मुस्लिम कानूनों में सुधार किया गया। हाल ही में सऊदी अरब के शासकों ने महिलाओं को वोट डालने का अधिकार दिया है और सऊदी शासक महिलाओं को उनके अधिकार देने के लिए भारतीय व्यवस्था का अध्ययन कर रहे हैं। पाकिस्तान ने भी 1961 में दूसरे विवाह पर रोक लगाते हुए एक सरकारी कौंसिल की स्थापना की थी तथा दूसरी शादी के इच्छुक व्यक्ति को उचित कारण बताकर अनुमति लेना जरूरी बना दिया था। भारत में कई मौके आए जब अदालतों ने शरीयत कानून के विरुद्ध निर्णय दिया, परन्तु भारत के राजनीतिज्ञों ने वोट बैंक के लालच में अदालतों के फैसलों की अवमानना की।
मैं यहां कुछ प्रकरणों का उल्लेख करना चाहूंगा।

मोहम्‍मद अदमद खान बनाम शाहबानो बेगम और अन्य (ए.आई.आर. 1985 एस.सी. 945) के प्रकरण में सन् 1985 में शाहबानो नाम की मुस्लिम महिला अपने पति द्वारा तलाक दिए जाने पर न्यायालय में गई। उच्चतम न्यायालय ने उसके पक्ष में निर्णय सुनाते हुए उसके पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश देते हुए यह सुझाव दिया कि मुस्लिम समुदाय को पर्सनल लॉ में सुधार के लिए आगे आना चाहिए। एक ‘समान नागरिक संहिता’ असमानता को मिटाकर राष्ट्रीय एकता के लिए सहायक होगी परन्तु 1986 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने संसद में विधेयक लाकर उच्चतम न्यायालय के निर्णय को ही पलट दिया और तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण के लिए सरकारी धन देने की व्यवस्था कुछ विशेष परिस्थितियों में की गई तथा पति को सभी प्रकार के उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया गया।

दूसरा प्रकरण श्रीमती जोर्डेन डेंगडेह बनाम श्री एस.एस. चोपड़ा (ए.आई.आर. 1985 एस.सी. 935) का है। विदेश सेवा में कार्यरत इस ईसाई महिला ने क्रिश्चियन विवाह कानून 1972 के अन्तर्गत एक सिख पुरुष से विवाह किया था। 1980 में अपने साथ की जा रही क्रूरता के आधार पर उसने तलाक की मांग की, परन्तु उसके तलाक की प्रार्थना स्वीकार नहीं की गई, तो उसने उच्चतम न्यायालय में पति के शारीरिक रूप से अक्षम होने के आधार पर तलाक की मांग की। उच्चतम न्यायालय ने इस विवाद पर निर्णय सुनाते हुए भारत के विधि एवं न्याय मंत्रालय को स्पष्ट रूप से दिशा-निर्देश जारी किया कि विवाह अधिनियम में पूर्णत: सुधार होना चाहिए तथा जाति एवं धर्म की परवाह न करते हुए एक समान नागरिक संहिता लागू की जानी चाहिए।
भारत में सरकारें बदलती रहीं। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर गठबंधन होते रहे, सरकारें बनती रहीं। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बाद देश में ही नहीं देश के बाहर भी यह संदेश भेजने की प्रक्रिया का सूत्रपात किया गया कि अटल जी की सरकार एक साम्‍प्रदायिक किस्म की सरकार थी, अब यहां धर्मनिरपेक्ष सरकार का वर्चस्व हो चुका है। धर्मनिरपेक्षता क्‍या है इसकी कानूनी या संवैधानिक व्याख्‍या आज तक नहीं हो सकी। कानून का नया विद्यार्थी भी जब भारत में संविधान की ओर एक विहंगम दृष्टि डालता है तो पाता है कि संवैधानिक दृष्टिकोण से भारत में 1976 से पूर्व धर्मनिरपेक्षता नहीं थी। भारत के संविधान के नीति निर्देशक तत्व या अधिकारों से सर्वधर्म समभाव झलकता था कि नहीं, मैं इस बहस में नहीं पडऩा चाहता पर यह शब्‍द धर्मनिरपेक्ष 42वें संशोधन के बाद प्राक्कथन में आया।

मैं आगे बढऩे से पहले दो और प्रमाणों को पेश करना चाहूंगा। एक और प्रकरण शायरा बानो नाम की मुस्लिम महिला का है, जिसने अपने एवं अपने बच्चों के भरण-पोषण के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा 1987 (ए.आई.आर. 1987 एस.सी. 1107) में खटखटाया। न्यायालय ने शाहबानो बेगम के केस का उदाहरण देते हुए भरण-पोषण का आदेश दिया। एक और मामला 11 मई, 1995 में उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय का है। एक हिन्दू महिला जिसके पति ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर दूसरी शादी कर ली थी, की याचिका पर निर्णय सुनाते हुए उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि हिन्दू कानून के अनुसार धर्मांतरण के पश्चात् पूर्व शादी समाप्त नहीं होती तथा पुनर्विवाह धारा 494 के अनुसार दंडनीय है। विवाह, तलाक और पंथ यह स्वभाव और बहुत कुछ आस्था और विश्वास का विषय है, सुविधा का विषय नहीं है।
 
न्यायालय के निर्णय में प्रधानमंत्री को संविधान के अनुच्छेद 44 पर स्वच्छ दृष्टि डालने को कहा गया, जिसमें राज्य के द्वारा सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की बात कही गई है। सरकार को यह भी निर्देश दिया गया कि विधि आयोग को स्त्रियों के वर्तमान मानवाधिकारों को दृष्टि में रखते हुए एक विस्तृत समान नागरिक संहिता का प्रारूप तैयार करने को कहा जाए। बीच में कालखंड में एक समिति बनाई जानी चाहिए जो इस बात का निरीक्षण करे कि कोई मतान्तरण के अधिकार का दुरुपयोग न कर सके। ऐसा कानून बनाना चाहिए जिससे प्रत्येक नागरिक जो धर्मांतरण करता है वह पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता। उच्चतम न्यायालय ने सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय के सचिव को भी यह निर्देश दिया कि उत्तरदायी अधिकारी के द्वारा अगस्त 1996 तक इस आशय का शपथ पत्र प्राप्त होना चाहिए कि न्यायालय के निर्देश के पश्चात् केन्द्र सरकार के द्वारा नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने हेतु कौन से कदम उठाए गए और क्‍या प्रयास किए गए, जो पिछले चार दशकों से शीत गृह में पड़ा हुआ है लेकिन सरकारों ने कुछ नहीं किया।
संविधान की आत्मा को पहचानने वाले, बड़े संविधानविदों का कहना है कि संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्‍द की जरूरत नहीं थी, यह संविधान की आत्मा में निहित भाव था, परन्तु श्रीमती इंदिरा गांधी को मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए ऐसा करना पड़ा। श्रीमती गांधी ने ऐसा क्‍यों किया? लेकिन धर्मनिरपेक्षता शब्‍द के साथ धर्म भी जुड़ा है अत: आइए बिना पूर्वाग्रह के इस ओर राष्ट्र के हित में एक दृष्टि डालें।
आज सारे विश्व के नीतिज्ञ इस बात को मानते हैं कि इस पृथ्वी पर श्रीकृष्ण से बड़ा राजनीति का जानकार कोई दूसरा नहीं था। विद्वानों की इस धारणा के बाद दूसरा नम्‍बर आता है कौटिल्य का और शेष आधे में विश्व के सभी राजनीतिज्ञ समेटे जा सकते हैं।
बस केवल ढाई राजनीतिज्ञ ही इस पृथ्वी पर हुए हैं। श्री कृष्ण ने विषम से विषम परिस्थिति में यह नहीं कहा कि मैं इस पृथ्वी पर ‘राजनीति’ की स्थापना करने को अवतरित हुआ। उनका स्पष्ट उद्घोष है-
”धर्मसंस्थापनार्थाय सम्‍भवामि युगे-युगे”मैं बार-बार आता हूं ताकि धर्म की स्थापना हो सके।इस धर्म में एक बात और छिपी है-”साधुओं का त्राण और दुष्टों का नाश”दूसरी बात जो आज विचारणीय है और सनातन वाङ्गमय के हर आराधक को जाननी होगी वह है भगवान के ये वचन कि ‘अपने धर्म में रहकर मृत्यु को प्राप्त होना अच्छा है, पर दूसरों का धर्म विनाशकारी है, वह भयावह है।” यह उक्ति विश्व के सबसे बड़े नीतिज्ञ की है। क्‍या यहां भगवान कृष्ण को हम साम्‍प्रदायिक कहें और अपनी ओढ़ी हुई धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर उन्हें नकार दें। क्‍या यह उचित होगा?
थोड़ा सा इस बात को इसलिए समझना होगा क्‍योंकि भारत में जो कानून बनते हैं, उनका सबसे बड़ा स्रोत धर्म है। ‘स्वधर्म’ की बात भगवान इसलिए करते हैं क्‍योंकि जन्म के साथ ही मनुष्य के संस्कार एक विशेष दिशा में बनने शुरू हो जाते हैं और उसी के अनुसार उसकी श्रद्धा का निर्माण होता है।
एक विशुद्ध आर्यसमाजी परिवार का उदाहरण लें। उस परिवार में उत्पन्न बालक को वेदों में अगाध निष्ठा होगी, वह एक ही ईश्वर को मानने वाला होगा, स्वामी दयानंद के विचारों पर आस्था रखने वाला होगा, स्पष्टवादी होगा। अगर ऐसे किसी युवक को आप यह कहें कि, ”तुम कल से पांचों वक्‍त नमाज पढऩी शुरू कर दो” तो यह उसके लिए विनाशकारी कृत्य हो जाएगा। हो सकता है वह विक्षिप्त हो जाए। ऐसा ही किसी आस्थावान मुस्लिम को यह कहें कि वह रोज सत्यनारायण की कथा घर पर करवाए तो उसकी क्‍या हालत होगी? वह असहज हो जाएगा।
अंग्रेजों के शासनकाल में १८७१ में विलियम विल्सन हंटर की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी का गठन अंग्रेजों ने मुसलमानों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए किया था। हंटर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए तत्कालीन भारतीय राज्य और हिन्दुओं को दोषी ठहराया था। जिस प्रकार हंटर कमेटी की सिफारिशों के गर्भ में अलगाववाद का बच्चा पलता रहा। वह बच्चा आज बड़ा हो चुका है।
मनमोहन सरकार ने २००५ में जस्टिस राजेन्द्र सच्चर की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाकर मुसलमानों के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का अध्ययन करवाया। सच्चर कमेटी ने जो सिफारिशें कीं वस्तुत: वह तुष्टीकरण का पुलिंदा मात्र हैं। सच्चर कमेटी ने यह भी सिफारिश की कि मुस्लिम बहुल चुनाव क्षेत्र मुस्लिमों के लिए आरक्षित कर दिए जाएं। यदि ऐेसे निर्वाचन क्षेत्र अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित हैं तो उन्हें भी रद्द कर दिया जाए। सरकार ने भी सच्चर कमेटी की सिफारिशों को यथावत लागू करने की बात मान ली। इस पर संसद में न तो बहस कराई गई न ही कोई कार्यवाही रिपोर्ट (एटीआर) पेश की गई। आखिर सरकार को जल्दी किस बात की थी, जबकि रिपोर्ट में मुसलमानों के पिछड़ेपन का मुख्‍य कारण जनसंख्‍या वृद्धि तथा शिक्षा की उपेक्षा का उल्लेख तक नहीं किया गया। मुसलमानों के पिछड़ेपन का कारण सब जानते हैं। इस देश में जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पद पर रहे। मोहसिना किदवई, नजमा हेपतुल्ला और अनेक मुस्लिम महिलाएं उच्च पदों पर रहीं। सलमान खुर्शीद,फारूक अ4दुल्ला और कई अन्य मुस्लिम मंत्री देश की सेवा कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि यही मनमोहन सरकार का एजैंडा है, जो सच्चर कमेटी की सिफारिशों के रूप में सामने आया है।
सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा, जरा उस पर भी नजर डालें। कमेटी ने कहा है कि मुसलमान अपने को सर्वत्र असुरक्षित महसूस करता है। नकाबपोश मुस्लिम महिलाओं तथा दाढ़ी और टोपी वाले मुसलमानों को बहुसंख्‍यक हिन्दू जनता घृणा और संदेह की दृष्टि से देखती है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी अल्पसंख्‍यकों के साथ अत्याचार करते हैं। मुसलमानों के साथ पूरी मशीनरी धार्मिक भेदभाव करती है। नौकरियों के चयन में मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जाता है। वोटर लिस्ट से जानबूझकर सरकारी मशीनरी मुसलमानों के नाम काट देती है। प्राथमिक स्तर पर उर्दू को प्रोत्साहन न मिलने से नवोदय की परीक्षा में मुसलमान बच्चे प्रवेश नहीं पाते हैं। इतनी शिकायतें दर्ज कराने के साथ ही मुस्लिमों की बदहाली दूर करने के लिए सच्चर ने जो सुझाव दिए हैं वे भी कम हास्यास्पद नहीं हैं। उनके अनुसार इस्लाम में 4याज का लेना या देना हराम है इसलिए बैंकों को मुस्लिमों के लिए अपनी व्यवस्था बदलनी चाहिए। जिले की सभी कल्याणकारी योजनाओं का एक निश्चित भाग मुसलमानों के लिए आरक्षित कर दिया जाए तथा इसके क्रियान्वयन के लिए मुसलमानों की एक कमेटी बना दी जाए। मदरसा शिक्षा बोर्ड को सीबीएसई के समान मान्यता दी जाए, जिसमें मदरसों की आधारभूत सुविधाओं तथा शिक्षकों का पूरा खर्च केन्द्र सरकार उठाए किन्तु शिक्षकों की नियुक्ति और पाठ्यक्रम निर्धारण में उसका कोई हस्तक्षेप न हो।
श्री किदवई, श्री हाशमी और श्री कुरैशी तथा जावेद हुसैन संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य रहे हैं। उन्होंने तो कभी मुसलमानों से भेदभाव की शिकायत नहीं की। सच तो यह है कि जिन मुसलमानों ने ऊंचे ओहदे संभाले वे काफी उच्च शिक्षा प्राप्त रहे। आश्चर्य होता है कि सच्चर कमेटी को इस लोकतंत्र की खासियत नजर नहीं आई, बल्कि उन्हें शिकायतें ही नजर आईं। पुलिस सेवा,नौकरशाही, लोकसेवा आयोग, अस्पताल, चिकित्सक तथा शिक्षा जगत में भी मुस्लिम उच्च पदों पर रहे तो हिन्दुओं द्वारा उनसे भेदभाव करने की बात को सच नहीं माना जा सकता
यह इस देश का दुर्भाग्य रहा कि १८९५ में एक अंग्रेज लार्ड एलन ओ1टावियन ह्यूम द्वारा स्थापित कांग्रेस ने शुरू से ही हिन्दुत्व विरोधी रवैया अपनाया और देश की आजादी के साथ विभाजन को भी स्वीकार कर लिया। कांग्रेस ने मजहब के आधार पर देश विभाजन के बाद भी अपनी हिन्दुत्व विरोधी व मुस्लिम तुष्टीकरण की राष्ट्र घातक नीति को नहीं छोड़ा। यह सिलसिला आज तक चल रहा है। मनमोहन सरकार ने तुष्टीकरण की सभी सीमाएं लांघ दी हैं। सरकार ने २००५ से केन्द्रीय योजना आयोग की वार्षिक योजनाओं में अनुसूचित जाति के लिए विशेष कम्‍पोनेंट योजना समाप्त कर दी थी। दूसरी ओर राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के आर्थिक संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का बना दिया।
२७ जून, १९६१ को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर अवगत कराया था कि मजहब के आधार पर किसी भी प्रकार का आरक्षण न किया जाए। इसी प्रकार १९३६ में पूना पैक्ट के बाद जब अंग्रेज सरकार ने अनुसूचित जाति की पहली सूची जारी की थी तो धर्मांतरित ईसाई व मुसलमानों की जातियां उसमें शामिल करने की मांग उठाई गई थी,जिसे अंग्रेज हुकूमत ने अस्वीकार कर दिया था। किन्तु मनमोहन सरकार इसमें भी नहीं चूकी और सच्चर कमेटी के बाद रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन करके धर्मांतरित ईसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का आरक्षण करने हेतु पैरवी प्रारंभ कर दी। प्रारंभिक तौर पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह ने भी इसका विरोध किया किन्तु सोनिया गांधी जैसों की सहमति देखकर शांत हो गए।
वस्तुत: १६ दिसंबर, २००४ को कैथोलिक विशप कांग्रेस आफ इंडिया ने नई दिल्ली में ३४ ईसाई और १४ गैर ईसाई अर्थात कुल ४८ सांसदों की बैठक बुलाई,जिनमें धर्मांतरित ईसाई और मुसलमानों को अनु. जाति के आरक्षण का लाभ दिलवाने संबंधी जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल करने का विचार तय हुआ। इस याचिका के संदर्भ में केन्द्र सरकार ने अपनी सहमति व्यक्त की,जिसका बयान सरकार के वकील ने कोर्ट में दिया, इस पर न्यायालय ने सहमति का आधार जानना चाहा। आधार बताने के लिए बड़े ही नाटकीय ढंग से रंगनाथ मिश्र आयोग बनाकर सरकार ने १० मई, २००७ को मनमानी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत कर दी जबकि सुप्रीम कोर्ट पंजाब राव बनाम मेश्राम (१९६५),रामालिंगम बनाम अब्राह्म (१९६७), सूसाई बनाम भारत संघ (१९८७) आदि विवादों से पहले ही इस विषय पर असहमति व्यक्त कर चुका है, लेकिन केन्द्र सरकार की नीयत कैसी विचित्र है कि १० मार्च, २००६ को अल्पसंख्‍यक शिक्षण संस्थानों में अनु. जाति एवं पिछड़े वर्ग के आरक्षण की व्यवस्था को छात्रों के प्रवेश के संबंध में समाप्त कर दिया गया जबकि धर्मांतरित ईसाई व मुसलमानों को अनुसूचित जाति का आरक्षण दिलवाने की पैरवी प्रार6भ कर दी गई। सचमुच में यह धर्मांतरण को प्रेरित करके भारत में हिन्दू जनसंख्‍या कम करने का गंभीर षड्यंत्र है।
सरकार की तुष्टीकरण की नीतियों के चलते अल्पसंख्‍यकों का झुकाव कांग्रेस की तरफ ही रहा जबकि हिन्दू राजनीतिक तौर पर बिखरा हुआ ही रहा। यही कारण रहा कि देश की सत्‍ता पर ऐसे लोग और दल काबिज हो जाते हैं जिन्हें हिन्दुत्व,राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता और अपने देश के गौरवशाली इतिहास और संस्कृति का ज्ञान ही नहीं होता। केन्द्र की सरकारों ने भारत विरोधी तत्वों को खुद इस देश में पनाह दी। भारत में ३ करोड़ बंगलादेशी घुसपैठिये देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके हैं। उन्होंने सरकारी सहयोग से अपनी संपत्तियां बना ली हैं। हिन्दुओं के धर्मस्थलों और शक्तिपीठों का सरकारीकरण किया जा रहा है, लेकिन दूसरों के धर्मस्थलों पर कोई नियंत्रण नहीं। सरकारी खजाने से अल्पसंख्‍यकों के धार्मिक स्थलों के रखरखाव पर खर्च होता है।
सरकार की नीतियों को लेकर अदालतों का दृष्टिकोण काफी कड़ा रहा है। सच्चर कमेटी की सिफारिशों को न लागू करने के संबंध में केन्द्र सरकार के विरुद्ध दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार के वकील को कड़ी फटकार लगाई है। उसने पूछा है कि आप गरीबी से लडऩा चाहते हैं तो फिर धर्म आड़े क्‍यों आ रहा है? क्‍या यह समुदाय विशेष का तुष्टीकरण करने का प्रयास तो नहीं है? क्‍या यह कमेटी इसी काम के लिए बनी है? क्‍या सरकार को सबकी भलाई के लिए पैसा खर्च करना चाहिए या किसी एक समुदाय विशेष के उत्थान के लिए। आखिर ९० मुस्लिम बहुल जिले चिन्हित कर उनमें मुस्लिमों की तरक्की के ही विशेष प्रयास क्‍यों किए गए हैं?सरकार केवल अल्पसंख्‍यकों के उत्थान के लिए कटिबद्ध है, बहुसंख्‍यकों के लिएक्‍यों नहीं? आप अंग्रेजों की तरह ‘बांटो और राज करो’ के सिद्धांत पर 1यों चलना चाहते हैं
धर्मनिरपेक्ष शब्‍द की धारणा के कारण हमारे देश को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र (Secular Nation) कहा जाने लगा। राष्ट्र का धर्म से कुछ लेना-देना नहीं इसलिए यह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यदि संविधान में शुरू से सैकुलर का अनुवाद धर्मनिरपेक्ष न करके सम्‍प्रदाय निरपेक्ष या पंथ निरपेक्ष कर दिया जाता तो भ्रांत धारणाएं पैदा नहीं होतीं। धर्मनिरपेक्षता को अस्त्र बनाकर हिन्दुत्व पर आघात किया जाता रहा। कांग्रेस, कम्‍युनिस्ट और अन्य दलों ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमान, ईसाइयों को विशेषाधिकार दिए जाने की मांग शुरू कर दी। वोटों के लालच में इस शब्‍द का खुला दुरुपयोग किया जाने लगा। जब कभी हिन्दू हितों की बात हो तो उन्हें धर्मनिरपेक्षता विरोधी बताकर विरोध किया जाने लगा। इस प्रकार धर्मनिरपेक्ष शब्‍द को हिन्दू विरोध का पर्यायवाची मान लिया गया। केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने हिन्दू मठों और मंदिरों की सम्‍पत्ति का दुरुपयोग रोकने के लिए एक आयोग बनाया था। तब अटल बिहारी वाजपेयी ने इस पर आपत्ति करते हुए संसद में कहा था कि क्‍या केवल मठों और मंदिरों की सम्‍पत्ति का ही दुरुपयोग होता है? क्‍या मस्जिदों और गिरजाघरों की सम्‍पत्ति का दुरुपयोग नहीं होता? क्‍या सैकुलर स्टेट में सबके लिए एक सा कानून नहीं होना चाहिए?
हमारे देश में रिश्वत देना और लेना दोनों ही कानूनी अपराध हैं और इसके लिए दंड का प्रावधान भी है। आजकल ‘सुविधा शुल्क’ के नाम से जाने जाने वाली रिश्वत को हमारी सरकार संविधान के अनुच्छेदों में संशोधन करके जनता तक पहुंचाती है तथा इस प्रकार यह वैध और प्रासंगिक बन जाता है। आजादी के समय से ही आरक्षण का हमारे देश के विकास के लिए कुछ खास जातियों और जनजातियों के लिए प्रावधान किया गया था लेकिन वोट बैंक पर अपना कब्‍जा बनाए रखने के लिए और अपनी झूठी भावना के साथ जनभावना जोडऩे के लिए इसकी अवधि आज तक बढ़ाई जा रही है। सरकारें बदलीं, लेकिन न ही वोट बैंक की राजनीति खत्म हुई और न ही आरक्षण की अवधि बढ़ाने का सिलसिला थमा। अलबत्ता आरक्षण का दायरा बढ़ा दिया गया और इसमें कोटा भी शामिल हो गया। वोटों की राजनीति ने मंडल कमीशन को जन्म दिया और गुर्जरों ने आंदोलन कर खुद के लिए कोटा हासिल किया या यूं कहें कि सरकार से कोटा छीना। यूपीए सरकार ने तो प्राइवेट सैक्‍टर में भी आरक्षण की बात कह डाली लेकिन चूंकि प्राइवेट सैक्‍टर पर सरकार का कोई प्रत्यक्ष अधिकार नहीं है इसलिए सरकार को इसमें असफलता ही हाथ लगी। सरकार ने प्राइवेट सैक्‍टर के लिए दूसरी चाल चली और घोषणा की कि सरकार सरकारी खरीद का 4 प्रतिशत उन कम्‍पनियों से करेगी जिनका स्वामित्व दलित और अनुसूचित जातियों के पास है।
हालांकि यह बात अलग है कि आरक्षण और कोटा जैसी सुविधाओं का लाभ असली जरूरतमंदों तक पहुंच नहीं पाता, बल्कि क्रीमीलेयर इसका फायदा ज्यादा उठाते हैं। आज हालात यह हैं कि पढ़ाई, नौकरी, व्यापार हर क्षेत्र में आरक्षण को जगह मिली है। यहां तक कि चिकित्सा के क्षेत्र में भी आरक्षण लागू है। यह बात समझ से परे है कि मानव जीवन से जुड़े पेशे में आरक्षण देना वोट बैंक की राजनीति के अलावा क्‍या हो सकता है? इसे तो सीधे तौर पर ‘राजनीतिक घूस’ कहा जा सकता है।
राजनीति की क्‍या परिभाषा होनी चाहिए, आज की परिस्थितियों को देखकर समझना मुश्किल नहीं। राजनीति मानवता से अलग ऐसे लोगों की भीड़ की बकवास है, जिन्हें अपने गिरेबां में झांकने में कोई दिलचस्पी नहीं परन्तु दूसरों के सद्गुण भी उन्हें ‘जहर’ लगते हैं, अत: यह शाश्वत दुष्टता का ही पर्याय है जबकि धर्म का मतलब है- धारण करने योग्य। क्षमा, करुणा, दया, परहित, ये सब धारण करने योग्य हैं। अत: जो इन्हें धारण करता है वह धार्मिक है। ऐसे में राजनीति क्‍या धर्म के साथ रह सकती है?

· राजनीति सड़े हुए लोगों की दुर्गंध है?

· धर्म स्थित प्रज्ञ महापुरुषों की सुगंध है। अत: राजनीति और धर्म का क्‍या मेल? लेकिन एक तीसरी श्रेणी भी है, बाहरी वेशभूषा में एक धार्मिक व्यक्ति लग रहा है, परन्तु भीतर ही भीतर जिसके हृदय में राजनीति ही अठखेलियां करती है, मैं ऐसे लोगों को धार्मिक श्रेणी में नहीं रखता। वे निकृष्टतम हैं, ये रंगे सियार हैं। विश्व के सर्वश्रेष्ठ नीति मर्मज्ञ कौटिल्य ने जब राष्ट्र की कल्पना की तो उसमें राजनीति शब्‍द कहीं नहीं था। आप सारा अर्थशास्त्र देख लें। आप को राजधर्म शब्‍द मिल जाएगा, आपको दंड नीति मिल जाएगी, राजनीति नहीं मिलेगी।
भगवान श्रीकृष्ण जैसे अवतारी पुरुष ने भी यह कभी नहीं कहा- मैं हर युग में ‘राजनीति’ की स्थापना करने आता हूं। वह कहते हैं- मैं धर्म की स्थापना और दुष्टों का नाश करने के लिए आता हूं। जिस दिन राष्ट्र ने भगवान कृष्ण के वचनों का मर्म समझ लिया, धर्म की स्थापना हो जाएगी और स्वत: ही हो जाएगा दुष्टों का नाश भी।

भगवान के वचन हैं, ‘विनाशाय च दुष्कृताम’ इसलिए आज का नेता धर्म से घबराया हुआ है। खास तो हैं ये कांग्रेस के नेता और उनके दुमछल्ले। उन्हें पता है जिस दिन राष्ट्र ‘धर्म प्राण’ हुआ, राजनेता समाप्त हो जाएगा और उसे ऐसी जगह दफना दिया जाएगा, जहां से वह कभी निकल कर नहीं आ सके। इसी डर से उसने एक शब्‍द गढ़ लिया- धर्मनिरपेक्षता। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ आप स्वयं जान लें- जो सारे मानवीय गुणों से विमुख हो, उसी को धर्मनिरपेक्ष कहा जाता है। उसके पास मानवीय गुणों को धारण करने की शक्ति नहीं लेकिन उसने अपना एक नया धर्म बना लिया है जो धर्मनिरपेक्ष है, उसकी नजर में धर्म क्‍या है, उसे देखें तो आप चमत्कृत हो जाएंगे।

पुराणों के अनुसार ऐसे लोग साधारण नहीं होते। या तो ये ब्रह्मज्ञानी होते हैं या परले दर्जे के मक्कार। आम जनता के लिए राजनेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं, अपशब्‍द बोलते हैं, निंदा करते हैं और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं। कारण एक ही है- उस हमाम की सदस्यता प्राप्त करना जहां प्रवेश करने पर राष्ट्रद्रोह भी क्षम्‍य है। आप अपराधी हों, तस्कर हों, घोटालेबाज हों, बदमाश हों, उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। पिछले 64 वर्षों से यही तमाशा जारी है। सारे देश के संवेदनशील लोग घबरा गए हैं। जरा इन आवाजों को सुनिये-

तस्कर, बिल्डर माफिया, लूट, अपहरण, क्‍लेशहाय! दलालों में बिका गांधी तेरा देश।सर्कस में लंगूर ने गजब दिखलाया खेलरेल घोटालों की चला, ब्रेक कर दिया फेल।मंत्री पद की शपथ ले, वो बोल मुस्कायसाईं इतना दीजिए, जा में कुटुम्‍ब समाय।आप जिसे चाहें वोट दें, जिसका चाहे साथ दें, चरित्र यही है। ऐसे में श्रीराम का नाम भी दिल में ही लें तो अच्छा है। न जाने कौन साम्‍प्रदायिकता का आरोप लगाकर आपको दूर भगा दे।
भारत में हिन्दू धर्म का बार-बार अपमान किया गया। हिन्दुओं के धर्मस्थलों का सरकारीकरण किया गया। कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार ने हिन्दुओं के आस्था स्थलों पर आघात करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हिन्दुओं के आराध्य देव श्रीराम द्वारा बनाए गए समुद्री सेतु श्रीराम सेतु को तोडऩे का प्रयास किया गया।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान श्रीराम के अस्तित्व को ही नकार दिया। जब इसके विरोध में जनमानस उमड़ा तो सरकार थर-थर कांपने लगी। जब अलगाववादियों और आतंकवादियों के दबाव में आकर जम्‍मू-कश्मीर के कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने बाबा अमरनाथ यात्रियों की सुविधा के लिए दी गई भूमि वापस ले ली तो हिन्दू समाज ने एकजुट होकर विरोध किया। इस आंदोलन में 11 हिन्दू शहीद हुए और एक हजार से अधिक लोग घायल हुए। स्वतंत्रता संग्राम में अपना अमूल्य योगदान देने वाले वीर सावरकर को आजादी के बाद भी कांग्रेस ने निशाना बनाया और मौत के बाद भी उन्हें अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
वीर सावरकर ने कहा था कि राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण करो-यह अखंड भारत की सुरक्षा का महामंत्र क्रांतिकारियों के पथ प्रदर्शक महान देशभक्त वीर सावरकर ने भारत संतानों को देते हुए 1955 में जोधपुर में हिन्दू महासभा के मंच से बोलते हुए कहा था- ”जब तक देश की राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण नहीं किया जाएगा तब तक भारत की स्वाधीनता, उसकी सीमाएं, उसकी सभ्‍यता व संस्कृति कदापि सुरक्षित नहीं रह सकेगी। मेरी तो हिन्दू युवकों से यही अपेक्षा है कि वे अधिक संख्‍या में सेना में भर्ती होकर सैन्य विद्या प्राप्त करें ताकि समय पडऩे पर वे अपने देश की स्वाधीनता की रक्षा में योगदान दे सकें। विद्यालयों में सैनिक शिक्षा अनिवार्य रूप में दी जाए।”
महान राष्ट्रवादी चिन्तक और विचारक वीर सावरकर ने क्‍या कहा था, इस पर विचार करना जरूरी है, उनकी कही बातें एक-एक करके सच हो रही हैं।
4 जून 1947 को वीर सावरकर ने कहा कि नेहरू का यह कथन गलत सिद्ध होगा कि भारत विभाजन से हिन्दू-मुस्लिम समस्या का सदा के लिए समाधान हो जाएगा। हिन्दू-मुस्लिम समस्या के समाधान के रूप में देश को खंड-खंड करने वालों को मैं चेतावनी देता हूं कि देश के बंटवारे से यह समस्या सुलझने के स्थान पर और अधिक उलझ जाएगी, क्‍योंकि यह प्रश्र दो जातियों का नहीं है। पाकिस्तान की स्थापना होते ही समस्या बढ़ेगी। अहमदाबाद में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से बोलते हुए वीर सावरकर ने 1937 में कहा था कि हमारे एकतावादी कांग्रेसी नेता उनकी हर अनुचित दुराग्रहपूर्ण मांग के सामने झुकते जा रहे हैं। आज वे वंदेमातरम का विरोध कर रहे हैं कल हिन्दुस्तान और भारत नामों पर एतराज करेंगे। उनका एकमात्र उद्देश्य भारत को दारूल इस्लाम बनाना है। तुष्टीकरण की नीति से उनकी भूख और बढ़ती जाएगी जिसका घातक परिणाम सभी को भोगना पड़ेगा। 7 अक्तूबर, 1944 को अखंड भारत सम्‍मेलन में वीर जी ने कहा था कि ”भारत को खंडित करके पाकिस्तान बनाने की मांग करके मुस्लिम लीग ने समस्त हिन्दुओं के स्वाभिमान को चुनौती दी है। कांग्रेसी नेताओं की मुस्लिम तुष्टीकरण की आत्मघाती नीति के कारण देश को खंड-खंड, अंग-भंग करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। देश के प्रत्येक हिन्दू को अपने राष्ट्र की अखंडता की रक्षा के लिए सर्वस्व होम करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
यदि उस समय वीर सावरकर की बात मानी जाती तो देश के बंटवारे का दु:ख नहीं भोगना पड़ता, परंतु कांग्रेस और गांधी जी की तुष्टीकरण की क्रियाओं ने हिन्दुओं के स्वाभिमान को समाप्त कर दिया। इस कार्य में गांधी जी के बाद में गीता पहले कुरान पढऩा ईश्वर, अल्ला तेरो नाम गाने से हिन्दुओं की मानसिक दृढ़ता निर्बल हुई और पाकिस्तान बन गया। जो वीर सावरकर ने कहा था अक्षरश: सत्य सिद्ध हुआ। बंटवारे से समस्या कम न होकर और बढ़ गई। आज फिर तुष्टीकरण का वही खेल गांधी की कांग्रेस सोनिया गांधी के नेतृत्व में खेल रही है। यदि वीर सावरकर की कही हुई बात हम आज भी मान लें तो भारत भावी दुर्दशा से बच सकता है। अब तो पाकिस्तान के आतंकी और भारत में छुपे हुए पाक-बंगलादेशी घुसपैठिए, अमरीका की नीति और कांग्रेस का तुष्टीकरण ये चार प्रकार के संकट देश पर आते हुए स्पष्ट दिख रहे हैं। इसमें धरती, आकाश, पहाड़, नदियां तो वहीं रहेंगी पर हिन्दुत्व और हिन्दुस्तान के अस्तित्व, स्वत्व और स्वाभिमान को खतरा बढ़ता जाएगा। वीर सावरकर का विरोध आजादी के बाद भी हुआ। जीते जी उनसे अन्याय किया गया और मृत्यु के बाद अपमान।
विडम्‍बना देखिए भरी जवानी में काला पानी भोगते हुए वीर सावरकर ने अखंड हिन्दू राष्ट्र की आजादी के लिए कोल्हू चलाया, उसी काले पानी के कीर्ति स्तम्‍भ से कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर ने वीर सावरकर के यशोगान का पत्थर हटवाकर उन महात्मा गांधी का पत्थर लगा दिया जिन्होंने वहां कभी दस मिनट चरखा भी नहीं चलाया।
यह एक स्वतंत्रता सेनानी का घोर अपमान है। केंद्र सरकार को चाहिए तो यह था कि नोटों पर वीर सावरकर का काले पानी में कोल्हू चलाते हुए का चित्र छापती, वीर सावरकर के नाम पर वहां मैडिकल कालेज, मुम्‍बई में विश्वविद्यालय बनवाती, वीर सावरकर एक्‍सप्रैस गाड़ी चलाती तथा पाठ्यक्रमों में वीर सावरकर का साहित्य पढ़ाती। आज देश चाहता है कि हिन्दुत्व और हिन्दुस्तान के भविष्य की रक्षा के लिए वीर सावरकर के विचारों को पुन: जीवित करके आगे बढ़ें तथा तुष्टीकरण के अंधेरे को दूर करके स्वाभिमान का वीर सावरकर रूपी सूर्य उदय हो।
मेरा निश्चित मत है कि वीर जी के मार्ग पर चल कर ही हम भारत के भविष्य को बचा सकते हैं। 1947 की गलतियों का प्रायश्चित करने का समय आ गया है। सावरकर जी की भी यह प्रबल इच्छा थी।
आजादी के बाद भी कांग्रेस और अन्य दलों ने सत्ता के लिए हमेशा हिन्दुवादी संगठनों को निशाना बनाया। इसे देश का दुर्भाग्य कहें या पंडित नेहरू का सौभाग्य कि उन्होंने भी उस समय तेजी से शक्तिशाली हो रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कुचलने का प्रयास किया। महात्मा गांधी की हत्या का घृणित आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। दिन-रात दुष्प्रचार कर जनता के मन में संघ के प्रति घृणा भर दी और इस तरह अपनी पार्टी और वंश का राजनीतिक मार्ग प्रशस्त कर दिया। महात्मा गांधी की हत्या में संघ निर्दोष पाया गया और दो वर्ष बाद उससे प्रतिबंध हटा लिया गया। कई बार संघ पर प्रतिबंध लगाया और हटाया गया। कांग्रेस आज भी पुराना खेल खेल रही है और तुष्टीकरण की नीतियों के चलते हिन्दू आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रही है। वर्तमान में यह भूमिका चिदम्‍बरम व दिग्गी राजा निभा रहे हैं। हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म को अपमानित किया जाता है जबकि हिन्दू धर्म किसी दूसरे धर्म का अपमान नहीं करता। इस पर मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है।

”सर्वपल्ली राधाकृष्णन जब एक छोटे ईसाई स्कूल में पढ़ते थे तभी से हिन्दू धर्म के प्रति ईसाई अध्यापकों के द्वेषपूर्ण उद्गारों को सुनते आए थे। स्कूल में लडक़ों को ‘बाइबल’ तो पढ़ाई ही जाती थी पर बात-बात में हिन्दू धर्म की हंसी उड़ाना भी ईसाई पादरियों का नित्यकर्म बन गया था। बालक राधाकृष्णन को यह बुरा तो लगता था पर धर्म के रहस्यों से अनजान होने के कारण वे अधिक बोल नहीं सकते थे। फिर भी इन बातों से उनका मन धर्म के स्वरूप की तरफ आकर्षित हो गया और वे इस विषय की पुस्तकों को पढक़र उन पर विचार करने लगे। उन्होंने स्वामी विवेकानंद की पुस्तकें पढ़ीं और उनसे उनको निश्चय हो गया कि हिन्दू धर्म ईसाई धर्म की अपेक्षा अधिक सारयुक्त और उपयुक्त है। अब वे ईसाई पादरियों की बातें सुनकर चुप नहीं रहते थे, वरन् कभी-कभी अपना असंतोष भी प्रकट कर देते थे।

वे ईसाई धर्म की निंदा नहीं करते थे, वरन् पादरियों की द्वेषदर्शी मनोवृत्ति की ही आलोचना करते थे। जब कोई पादरी उनके सामने हिन्दू धर्म की निंदा करता तो वे कहने लगते-’पादरी महोदय! आपका धर्म दूसरे धर्मों की निंदा करना ही सिखाता है क्‍या ?’

पादरी उत्तर देते- ‘और हिन्दू धर्म? क्‍या दूसरों की प्रशंसा करता है? ‘हां, वह कभी दूसरों के धर्म को बुरा नहीं कहता। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने यही कहा है कि किसी भी देव की उपासना करने से मेरी ही उपासना होती है और मैं उसका प्रतिफल देता हूं। ये विभिन्न मजहब और सम्‍प्रदाय उन अनेक रास्तों की तरह हैं जो विभिन्न दिशाओं से आकर एक ही केन्द्र पर मिल जाते हैं। इनमें से किसी को सच्चा और अन्यों को झूठा कहना उचित नहीं।’
इस राष्ट्र में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े कांग्रेसियों ने राष्ट्रवादियों को आतंकवादी करार देने की पूरी कोशिश की। यह सौ प्रतिशत सत्य है कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता। यदि कोई भगवा, हरा, काला, नीला या अन्य किसी रंग को आतंक का प्रतीक बताता है तो वह गलत है। ये सब प्रकृति के उपहार हैं। भगवा शब्‍द भगवान या ईश्वर का प्रतीक है लेकिन इस देश में भगवा रंग पर काली सियासत की गई। अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए गृहमंत्री पी. चिदम्‍बरम, दिग्विजय सिंह या कुछ अन्य नेताओं ने भगवा आतंकवाद के जुमले का सहारा लिया। ये लोग भगवा आतंकवाद पर प्रहार करके मुस्लिम समुदाय के बीच नायक बनना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति अनर्थकारी है। गृहमंत्री और उनके समर्थकों को इतिहास में झांक कर देखना चाहिए कि भगवा संस्कृति और उनके अनुयायी कितने उदार और अहिंसक रहे हैं।
जरा याद कीजिए कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी की तुलना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से करके अपनी राजनीतिक अपरिपक्‍वता का प्रमाण दिया था।  1962 के भारत-चीन युद्ध के समय संघ के कार्यकर्ताओं ने जिस प्रकार भारत की सेनाओं का मनोबल बढ़ाने के लिए खुद पूरे देश में आगे बढक़र नागरिक क्षेत्रों में मोर्चा सम्‍भाला था उसे देखकर स्वयं पं. नेहरू को इस संगठन की राष्ट्रभक्ति की प्रशंसा करनी पड़ी थी और उसके बाद 26 जनवरी की परेड में संघ के गणवेशधारी स्वयंसेवकों को शामिल किया गया था। 1965 के भारत-पाकयुद्ध के समय भी संघ के स्वयंसेवकों ने पूरे देश में आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने में पुलिस प्रशासन की पूरी मदद की थी और छोटे से लेकर बड़े शहरों तकमें इसके गणवेशधारी कार्यकर्ता नागरिकों को पाकिस्तानी हमले के समय सुरक्षा का प्रशिक्षण दिया करते थे। इनकी जुबान पर हमेशा भारत माता की जय का उद्घोष रहता है।
बटला हाऊस मुठभेड़ में शहीद हुए इंस्पैक्‍टर महेश शर्मा की शहादत का अपमान किया गया।
26/11 के मुम्‍बई हमले में शहीद हुए एटीएस चीफ हेमंत करकरे और साथियों की शहादत पर सवालिया निशान लगाया गया। आखिर क्‍यों?
बटला हाऊस मुठभेड़ जांबाज पुलिस बलों की सफलता थी। मारे गए आतंकी मुसलमान थे। कांग्रेस के भोंपू दिग्विजय सिंह के लिए मौका था। दिग्गी ने आजमगढ़ दौरे के दौरान बटला हाऊस मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग कर डाली। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की तरफ से शहीद महेश चन्द्र शर्मा के परिवार से सहानुभूति व्यक्त करने की बजाय आरोपी आतंकियों के परिवार से सहानुभूति व्यक्त की गई।
26/11 के मुम्‍बई हमले में शहीद हेमंत करकरे को लेकर पहले अब्‍दुल रहमान अंतुले और बाद में दिग्गी राजा ने सवाल उठाए। दिग्गी राजा ने सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किया कि हेमंत करकरे ने हमले से दो घंटे पहले उनसे फोन पर बातचीत की और करकरे ने हिन्दू संगठनों से अपनी जान को खतरा बताया था। उनकी इस बातचीत का कोई फोन रिकार्ड नहीं मिला। दुनिया जानती है कि 26/11 हमले के जिम्‍मेदार पाक के आतंकी संगठन हैं तो फिर इस हमले का रुख हिन्दू संगठनों की ओर मोड़ कर दिग्गी ने भारत सरकार के स्टैंड को ही कमजोर किया। कांग्रेस ने शहीदों की शहादत को झुठलाने का काम किया। शहीद करकरे की पत्नी भी कांग्रेस के रवैये से आहत हुईं और उन्होंने कांग्रेस की निंदा की लेकिन कांग्रेस खामोश रही। उसे तो मुस्लिम वोट बैंक की चिंता है। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु और 26/11 मुमबई हमले के दोषी कसाब को फांसी की सजा पर भी कांग्रेस ने जमकर साम्‍प्रदायिक राजनीति की।
अफजल का अर्थ होता है विद्वान और श्रेष्ठ लेकिन आजकल एक और ही अफजल को लेकर देश में बहस छिड़ी है। आज की तारीख में अफजल गुरु वह शख्‍स है, जिसको भारतीय संसद पर वर्ष 2001 के हमले के मामले में न्यायालय ने फांसी की सजा दी है। न्यायालय के आदेशानुसार अफजल को 20 अक्तूबर, 2006 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी जानी थी, लेकिन सियासतदानों की कारस्तानी और सरकार के ढुलमुल रवैये के कारण 11 अक्तूबर, 2006 को निर्णय लिया गया कि अगले आदेश तक अफजल को फांसी नहीं दी जाएगी। भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने इस आशय का पत्र तिहाड़ जेल प्रशासन को लिखा, जिसकी पुष्टि जेल प्रशासन ने भी की। अफजल प्रकरण में जिस प्रकार से केन्द्र में काबिज सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने बयान जारी किए हैं, वह किसी भी सूरत में राष्ट्रहित में नहीं कहे जा सकते हैं। काबिले गौर है कि जब भी कहीं भारत राष्ट्र का जिक्र किया जाता है तो वहां प्रतीक के रूप में संसद या अशोक स्तम्‍भ प्रयुक्त किया जाता है। अफजल ने किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि संसद पर हमले की पृष्ठभूमि का ताना-बाना बुनकर पूरे राष्ट्र पर हमला किया। उसने भारत की अखंडता और सम्‍प्रभुत्ता को तार-तार करने का गुनाह किया है, जिसकी सजा मौत और सिर्फ मौत है, लेकिन हमारे सियासतदानों, विशेषकर कांग्रेसियों ने जिस तरह से वोट की राजनीति से अभिभूत होकर मुस्लिम तुष्टीकरण का खेल खेला है, वह किसी भी सूरत में सच्चे भारतीय के लिए सहनीय नहीं है। सबसे पहले जम्‍मू-कश्मीर के मुख्‍यमंत्री गुलाम नबी आजाद और फिर वहीं के पूर्व मुख्‍यमंत्री फारूक अब्‍दुल्ला का कहना कि यदि अफजल को फांसी दी जाती है तो प्रदेश की कानून-व्यवस्था बिगडऩे की आशंका है, हास्यास्पद लगता है। आखिर एक व्यक्ति जिसने पूरे राष्ट्र के प्रजातंत्र के मंदिर पर हमला किया है, उसको सजा नहीं दिए जाने की पैरवी एक जिम्‍मेदार व्यक्ति द्वारा करना ठेस पहुंचाता है। इतना ही नहीं, गुलाम नबी आजाद के बयान का जिस प्रकार से कांग्रेस ने समर्थन किया, वह समझ से परे था। कई राज्यों में होने वाले विधानसभा और निकाय चुनावों के कारण कांग्रेस ने अफजल मामले को उलझाकर रख दिया था। 26/11 के मुम्‍बई हमले में पकड़े गए एकमात्र जीवित आतंकवादी कसाब के मामले में भी यही रुख अपनाया गया
कसाब को सजा सुनाए जाते समय सत्र न्यायालय ने जो टिप्पणियां की थीं, वे काफी आंखें खोलने वाली थीं। न्यायालय ने कहा था कि ”कसाब जैसे आतंकवादी सुधर नहीं सकते। जेहाद के नाम पर धर्मांध लोग कुछ भी कर सकते हैं या इनसे कुछ भी कराया जा सकता है। बेशक ये देश और समाज के साथ मानवता के भी दुश्मन हैं और इन्हें छोड़ देना उपरोक्त तीनों को खतरे में डालना है।”
मौत से हर व्यक्ति डरता है, इसलिए फांसी से अधिक भय पैदा करने वाली सजा कोई दूसरी नहीं हो सकती। अब मानवाधिकार के कुछ समर्थक पहले की ही तरह यह दलीलें दे रहे हैं कि मृत्युदंड की सजा प्रकृति के नियम के खिलाफ है और किसी को भी किसी का जीवन छीनने का अधिकार नहीं। बेशक वे यह बात कहते हुए बेशर्मी से इस बात को भूल जाएंगे कि जिन मासूम निर्दोषों को इन हैवान बन चुके इंसानों ने बेवजह गोलियों से भून डाला, जीने का अधिकार तो उनको भी था। कसाब के मुकद्दमे और उसकी कड़ी सुरक्षा पर सरकार ने केवल इसलिए करोड़ों रुपए खर्च कर दिए कि कोई यह न कहे कि भारत में आतंकवादी कसाब के साथ कोई नाइंसाफी हुई है।
इंदिरा गांधी ने राजनयिक रविन्द्र हरेश्वर म्‍हात्रे की हत्या होने दी लेकिन मकबूल बट्ट को रिहा नहीं किया था। मकबूल बट्ट को फांसी की सजा दी गई थी। केन्द्र सरकार को याद रखना चाहिए कि पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल अरुण कुमार वैद्य के हत्यारे को क्षमादान देने की याचिका पर तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने महज 13 घंटे के भीतर फैसला किया था। एक नहीं कई उदाहरण कांग्रेस के सामने मौजूद हैं। यह देश कैसे उदाहरण स्थापित करना चाहता है, इसके बारे में कांग्रेस को सोचना होगा। यदि भारत को बचाना है तो आतंकवाद और न्यायिक फैसले को राजनीति में घसीटा नहीं जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। कांग्रेस को देश के सम्‍मान की नहीं अपना सम्‍मान बचाने की चिंता है, इसलिए वह केवल वोटों को निहारती है।
भारत पूरी दुनिया में श्रीराम और श्रीकृष्ण की भूमि के रूप में जाना जाता है, लेकिन अफसोस अयोध्या में आज तक भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण नहीं हो सका। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद मामला सर्वोच्च न्यायालय में है। श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर जितनी राजनीति इस देश में की गई, उतनी तो मस्जिदों के स्थानांतरण को लेकर मुस्लिम राष्ट्रों में भी नहीं हुई। अफसोस श्रीकृष्ण जन्मभूमि और हिन्दुओं के अन्य आस्था स्थल भी मुक्त नहीं हैं।
हिन्दुओं की सहिष्णुता की परीक्षा सैकड़ों वर्ष पहले ही शुरू हो गई थी। 1920 में गांधी जी ने कांग्रेस को खिलाफत आंदोलन में झोंक दिया और आजादी की लड़ाई दरकिनार हो गई। कारण था कि खिलाफत आंदोलन में बोलते हुए मौलाना अब्‍दुल बारी ने कहा था कि ”मुसलमानों का सम्‍मान खतरे में पड़ जाएगा, यदि हमने हिन्दुओं का सहयोग नहीं लिया। हमें गौ वध बंद कर देना चाहिए क्‍योंकि हम एक ही भूमि की संतान हैं’ किन्तु सम्‍मान का खतरा भारत में नहीं था। यह तुर्की के मुसलमानों की समस्या थी, जिसे भारतीय मुसलमान ओढक़र चल पड़े थे। 1857 के बाद आजादी की लड़ाई में भारतीय मुसलमानों ने कब साथ दिया? वे 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद से ही अलग से मुस्लिम राष्ट्र की प्राप्ति के लिए आगे बढऩे लगे थे। 1946 का चुनाव इस केन्द्रीय प्रश्र पर ही लड़ा गया था कि भारत अखंड रहे या उसका विभाजन हो और उस चुनाव के परिणामों से स्पष्ट है कि 99 प्रतिशत हिन्दुओं ने कांग्रेस के ‘अखंड भारत’ के आह्वान के समर्थन में वोट दिए तो 97 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम समाज ने जिन्ना के ‘पाकिस्तान’ की मांग के समर्थन में वोट डाले और मौलाना आजाद जैसे राष्ट्रवादी नेता की पूर्ण उपेक्षा कर दी।
1947 में मिली विभाजित आजादी से लेकर आज तक हुए छोटे-बड़े एक हजार हिन्दू-मुस्लिम दंगे किसने किए? इसका विश्लेषण होना जरूरी है।
सब जानते हैं कि राष्ट्रीय एकता की स्थापना तब तक नहीं हो सकती जब तक सब के मन में स्वदेशी पूर्वजों के प्रति सम्‍मान, इस देश की पुरातन संस्कृति के प्रति अपनत्व और गौरव और मातृभूमि के प्रति भक्ति का भाव न हो। युगोस्लाविया, चीन, बुल्गारिया आदि ने जो मुस्लिम समस्या को हल करने के लिए लम्‍बे प्रयास किए, वह असफल क्‍यों हो गए? इंग्लैंड जैसे उदारवादी देश में बसे मुसलमानों की यह मांग उठती रही है कि एक धार्मिक सम्‍प्रदाय के नाते उनके लिए अलग संसद बनाई जाए?
क्‍यों मुस्लिम समस्या ही हमारे लम्‍बे स्वातंत्र्य संघर्ष के मार्ग में बाधा बनकर खड़ी रही और क्‍यों देश विभाजन के बाद भी ‘स्वतंत्र भारत’ की राजनीति भी आज तक इस ‘समस्या’ के चारों ओर घूम रही है? ‘मुस्लिम पहचान की रक्षा’ के पुराने प्रश्र, जिसके ‘द्विराष्ट्रवाद’ के सिद्धांत ने ‘पाकिस्तान’ के रूप में भारत के सिर पर ‘स्थायी शत्रु’ बनाकर खड़ा किया, पुन: विकराल रूप लेकर खड़ा हो गया है? कुछ गिने-चुने देशभक्त उदारवादी मुस्लिम नेता अवश्य चिंतित हैं किन्तु उनकी आवाज मुस्लिम समाज में ‘नक्कारखाने में तूती’ की आवाज जैसी ही है।
कांग्रेस का जनाधार जब भी खिसकता है या उसे भ्रष्टाचार और घोटालों के कारण झटके पर झटका लगता है तो वह ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाने की फिराक में रहती है कि देश के 18 करोड़ मुस्लिम मतदाता किसी न किसी तरह पट जाएं। नरसिम्‍हा राव शासन में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुस्लिम मतदाता उससे अलग हो गए थे जो आज तक पूरी तरह उसके साथ जुड़ नहीं सके। कभी वह हिन्दू संतों को निशाना बनाती है, कभी हिन्दुत्व पर प्रहार करती है तो कभी हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ करती है।
सोनिया गांधी की बनाई नैशनल एडवाइजरी काउंसिल के कुछ मुस्लिम व वामपंथी सदस्यों द्वारा बहुसंख्‍यक हिन्दुओं के खिलाफ कड़ा कानून बनाने को तैयार किए गए मसौदे को ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कानून बनाने की जी-जान से कोशिश कर रहे हैं। यह मसौदा यदि विधेयक के रूप में संसद में आया और पास हो गया तो देश में एक और बंटवारे का रास्ता तैयार हो जाएगा क्‍योंकि इसमें ईसाई और मुसलमानों को संरक्षण देने के लिए ऐसे प्रावधान रखे गए हैं जिससे हिन्दुओं की हालत गुलाम जैसी हो जाएगी। सोनिया गांधी खुद ईसाई हैं। वह आगे चुनावों में कांग्रेस की जीत की रणनीति के तहत मुसलमानों को खुश करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। इसी योजना के तहत साम्‍प्रदायिकता विरोधी विधेयक लाने की जोर-शोर से तैयारी चल रही है लेकिन इसकी पहली बैठक में ही 6 राज्यों के मुख्‍यमंत्रियों ने नहीं आकर विरोध जता दिया। उड़ीसा के मुख्‍यमंत्री ने कह दिया कि यह बिल तो ऐसा है कि यदि कहीं पर किसी अल्पसंख्‍यक ने कुछ किया और दंगा हुआ तो बहुसंख्‍यक समुदाय के खिलाफ कार्रवाई होगी। इसके अलावा इस मुद्दे पर केन्द्र सरकार राज्य सरकार को बर्खास्त भी कर सकती है। इससे तो इस देश के बहुसंख्‍यक हिन्दुओं की हालत गुलामों की हो जाएगी। सोनिया गांधी अमरीका व ईसाई जमात के अलावा मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए अपनी देखरेख में बनवाए साम्‍प्रदायिकता विरोधी बिल को अपने यसमैन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मार्फत लाने की तैयारी कर रही हैं। पहली बैठक में तो सब कुछ उल्टा पड़ गया, लेकिन उस मसौदे में कुछ इधर-उधर करके फिर उस पर बहुमत बनाने की कोशिश होगी। किसी भी तरह इसे फरवरी 2012 तक संसद में पास कराकर मुसलमानों को खुश करने की योजना है लेकिन पहली बैठक में तो झटका लग गया।
यूपीए सरकार में जयचंदों और मीर जाफरों की कोई कमी नहीं है जिनका एकमात्र लक्ष्य सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ कर अपना उल्लू सीधा करना है। साम्‍प्रदायिक हिंसा रोकने को विधेयक 2006 में संसद में पेश कर दिया गया था, लेकिन इसमें पारित नहीं किया जा सका था। भाजपा ने जब इसका विरोध किया था तो कांग्रेस ने उसे साम्‍प्रदायिक करार दिया था। इस विधेयक में देश के नागरिकों को अल्पसंख्‍यक, बहुसंख्‍यक, दलित-पिछड़े, जातियों के मध्य विभाजित किया गया है। संविधान विशेषज्ञ भी यह मानते हैं कि धारा 15 में यह साफ-साफ कहा गया है कि जाति या धर्म के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। यह संविधान की मूल भावना है तथा सामान्य संशोधन से भी इसे अपवाद के तौर पर भी नहीं छोड़ा जा सकता। यह विधेयक इसी आधार पर भेदभाव मूलक है। वैसे भी संविधान में अल्पसंख्‍यक-बहुसंख्‍यक की कोई व्याख्‍या ही नहीं की गई। देश में कहीं पर कोई भाषा के आधार पर अल्पसंख्‍यक है तो कहीं धर्म के आधार पर बहुसंख्‍यक इसलिए इस विधेयक को कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति के रूप में देखा जा रहा है। बाकी चर्चा मैं कल के लेख में करूंगा।
दुनिया के किसी देश में धर्म के नाम पर कोई साम्‍प्रदायिक हिंसा विधेयक नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने साम्‍प्रदायिक हिंसा विधेयक का मसौदा तैयार कर डाला। इसके अधिकांश सदस्य ‘सैकुलर ब्रिगेड’ के हैं, जिनमें भाजपा और हिन्दुत्व विरोधी अभियानकर्ता हर्षमंदर, अरुणा राय का नाम लिया जा सकता है।
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह का कहना है कि देश के संसाधनों पर ”मुस्लिमों-अल्पसंख्‍यकों का प्रथम अधिकार है।” प्रधानमंत्री ने फरमाया कि साम्‍प्रदायिक दंगों, आतंकी विस्फोटों की जांच करने वाली एजैंसी को पूर्वाग्रह मुक्‍त, स्वतंत्र और निष्पक्ष छानबीन करनी चाहिए।
न्यायाधीश राजेन्द्र सच्चर रपट के अनुसार सन् 1947 से सन् 2007 के 60 वर्षों में मुस्लिमों की आर्थिक, सामाजिक दशा दयनीय रही अर्थात सत्तारूढ़ कांग्रेस ने मुस्लिम प्रेम के पाखण्ड में उन्हें मुख्‍यधारा से नहीं जोड़ा। मुस्लिमों के युवजन उच्च शिक्षा, विशेषज्ञता शिक्षा में पिछड़ गए।
देश में प्रधान न्यायाधीश हिदायतुल्ला रहे। राष्ट्रपति पद पर डा. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद, डा. एपीजे अब्‍दुल कलाम रहे। विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक देश अमरीका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, कनाडा, अफ्रीका आदि में अल्पसंख्‍यक मुस्लिम को राष्ट्रपति पद नहीं मिला।
सन् 2004 लोकसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल लोकसभा क्षेत्रों में पीएम सईद, बेगम नूरबानो रामपुर, सीके जाफर शरीफ आदि क्‍यों हारे?
विश्व के महाकोषों में समाज से सम्‍प्रदाय शब्‍द बना है। अधिकांश विकसित देश साम्‍प्रदायिकता (कम्‍युनलिज्म), धर्म निरपेक्षता (सैकुलरिज्म) शब्‍दों का प्रयोग करना ही नहीं चाहते। दूसरे देशों में हिंसा करने वाले समाजकंटक अपराधी हैं। उन्हें धार्मिक चश्मे से नहीं देखा जाता है। अधिकांश शासनाध्यक्षों-राष्ट्राध्यक्षों के धार्मिक स्थल (गिरजाघर, मस्जिद, बौद्ध विहार, यहूदी मंदिर आदि) में पूजा करते चित्र नहीं प्रकाशित होते हैं।
देश में 10 वर्षों में आतंक से लड़ते 1851 नागरिकों और 6728 पुलिस जवानों ने शहादत दी। उनमें अधिकांश हिन्दू थे।
1980 के दशक में जब पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से सारा पंजाब धू-धू कर जल उठा, राष्ट्र विरोधी ताकतों ने हिन्दू-सिखों के शाश्वत संबंधों पर कुठाराघात किया। बसों से उतार कर एक ही समुदाय के लोगों को मारा जाने लगा, तो हजारों हिन्दू परिवार पंजाब छोडक़र पलायन कर गए। आज इस घटना का जिक्र तक नहीं किया जाता। मैं पहले भी कहता आया हूं।
”जुनून हिन्दू का हो या हो जुनून मुस्लिम काजब भी जलते हैं, गरीबों के घर जलते हैं।”आइए गुजरात चलते हैं। गोधरा की घटना एक राजनीतिक षड्यंत्र था, जिसे राष्ट्रद्रोहियों ने रचा था, उस षड्यंत्र के तार सीमा पार से जुड़े थे, उनका उद्देश्य वही था, जिसमें वह सफल हुए। योजना के मुताबिक ट्रेन अग्रिकांड की घटना गोधरा के बदले चिंचलाव स्टेशन पर घटनी थी। चिंचलाव में इसे 100 गुणा ज्यादा वीभत्स बनाया जाना था। ट्रेनों के समय में विलम्‍ब के कारण यह कार्यक्रम बदला गया। 56 रामभक्त जिंदा जला दिए गए। अगर गोधरा कांड न होता तो दंगे भी नहीं होते।

”गोधरा में जो मरे, वो निरपराध थे,
बाद में जो मरे, वो भी निरपराध थे।”मैंने स्वयं गोधरा के बाद हुए दंगों को हिन्दुत्व पर कलंक बताया था लेकिन कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों ने गोधरा ट्रेन नरसंहार को महज हादसा बताने का प्रयास किया। कई जांच आयोग बने। चुनावों के ठीक पहले ऐसी रिपोर्ट लीक की गई जिसने इस कांड को महज हादसा बताया। हिन्दू संगठनों को फासिस्ट करार दिया गया। कांग्रेस ने गांधी के गुजरात को गोडसे का गुजरात करार दिया। उसका उद्देश्य मुसलमानों को भडक़ा कर वोट प्राप्त करना था। श्रीमती सोनिया गांधी ने भी कांग्रेस चुनाव अभियान की शुरूआत श्रीगणेश, अम्‍बा जी के मंदिर में दर्शन करके किया था। हिन्दुओं के वोट हड़पने के लालच में किए इस नाटक का क्‍या असर होना था, इसकी प्रतिक्रिया हिन्दू मतदाताओं पर कांग्रेस के विरुद्ध ही हुई।
”ऐ रहबरे मुल्को कौम बताये किसका लहू है, कौन मरा?”बात 1984 की है। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सारे राष्ट्र में दंगे भडक़ उठे थे। सिखों पर हमले किए गए। नग्न आंखों से क्रूरता का यह तांडव सभी ने देखा। अकेले दिल्ली शहर में मृतकों की संख्‍या 2733 बताई गई मगर सत्य कुछ और ही था। पूरे राष्ट्र ने देखा, यह कांग्रेस प्रायोजित आतंकवाद था। कई आयोग बने, लेकिन नानावती कमीशन की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गई अगर कांग्रेस में हिम्‍मत थी तो कपूर-मित्तल की रिपोर्ट को सार्वजनिक क्‍यों नहीं किया गया। कभी जैन-बनर्जी कमेटी के पर कतरे गए, कभी जैन-अग्रवाल कमेटी की रिपोर्टें झूठी याचिकाओं के बल पर सार्वजनिक नहीं होने दीं। कभी पोटी-रोशा कमेटी गर्भ में ही भ्रूण हत्या का शिकार हुई। दंगों के दौरान एक वृद्ध सिख की विधवा की याचिका पर तत्कालीन न्यायमूर्ति अनिल देव सिंह ने जब फैसला दिया तो सभी की आंखें खुल गईं। यह दिल्ली हाईकोर्ट की बात है।
”अपनी ही मातृभूमि में अपने ही लोगों द्वारा नृशंसतापूर्वक कत्ल किए जाने की घटनाओं की वेदना की बात सोचने से अनुभव होता है कि क्‍या ऐसे लोग जंगली जानवरों से बदतर नहीं हैं?”आज मैं उस कविता की पंक्तियों को लिखना चाहूंगा जो उस फैसले का हिस्सा हैं, जो कविता रवीन्द्रनाथ टैगोर ने रची और जिसका भाव है कि जंगली जानवरों के साथ एकांत विचरण करने वाले को भी उतना भय शायद महसूस न हो, जितना इन दो पाये दरिन्दों के साथ तब इन्सान को था।
कविता को देखें-“If I 2ere the soil. I 2ere the 2ater if I 2ere the grass or fruit or flo2er if I 2ere to roam about the earth 2ith beasts there 2ould be nothing to fear, in ne1er ending ties 2here e1er I go, It 2ill be the limitless me”.जब न्यायालयों के फैसलों में ऐसी बातें आ चुकी हैं, तो जांच आयोगों की रिपोर्टों की क्‍या कीमत? जांच तो रंगनाथ मिश्र ने भी की थी। सच तो उन्होंने भी बोलने की शुरूआत की थी, लेकिन वाह रे राज्यसभा का सत्ता सुख, एक अवकाश प्राप्त न्यायाधीश की सारी गरिमा धूल धूसरित हो गई। सब जानते हैं कि वह कौन से बेइमान, भ्रष्ट और कर्त्तव्यहीन अधिकारी थे जो अपने आकाओं के बल पर दंगे करवाने को ही अपना कर्त्तव्य समझ रहे थे।
कौन थे इनके आका। दंगाइयों को किसने छूट दी? पुलिस मौन दर्शक क्‍यों बनी रही? कांग्रेस ने सत्य के साथ छल किया।
कांग्रेस ने देश की विभिन्न जातियों में अविश्वास पैदा कर अपना उल्लू सीधा किया। इस पर मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है-राजकुमार और नगर सेठ के बेटे की दोस्ती से मगध नरेश बहुत दु:खी थे। लाख प्रयास के बावजूद दोनों की दोस्ती टूट नहीं रही थी। राजकुमार को गलत संगत से बचाने के लिए राजा ने मंत्रियों से सलाह ली और फिर इस काम के लिए उन्होंने सबसे चतुर मंत्री को लगाया। एक दिन राजकुमार और नगर सेठ के बेटे बातचीत में मशगूल थे। इतने में मंत्री जी आए और इशारे से राजकुमार को अपने पास बुलाया। मंत्री ने राजकुमार से कुछ कहा और फिर वे वापस लौट गए। मंत्री के जाने के बाद नगर सेठ के बेटे ने राजकुमार से मंत्री के आने का उद्देश्य पूछा पर राजकुमार ने कुछ नहीं बताया। दूसरे दिन इसी तरह मंत्री जी फिर आए और इस बार नगर सेठ के बेटे को बुलाकर कुछ कहा। फिर चलते बने। राजकुमार ने भी अपने मित्र से मंत्री से हुई बात के बारे में पूछा पर नगर सेठ के बेटे ने कुछ नहीं बताया। इस घटना के बाद दोनों के बीच अविश्वास का वातावरण पैदा हो गया। मंत्री जी अपनी चाल में कामयाब हो गए क्‍योंकि उन्होंने दोनों को बुलाकर कुछ भी नहीं कहा था। सिर्फ अविश्वास पैदा करने की नीयत से अपने पास बुलाया था। राजा को दोनों की मित्रता टूटने की खबर से अत्यधिक प्रसन्नता हुई क्‍योंकि जो कार्य साम, दाम, दंड से नहीं होता वह काम अविश्वास पैदा करने से हुआ। कांग्रेस सरकारों ने हमेशा ही जातियों में अविश्वास पैदा कर सत्ता तक का सफर तय किया
वर्ष २०११में हज यात्रा पर भारत सरकार 1250 करोड़ अधिक धन राशि खर्च की । इसमें सवा लाख यात्रियों में से हर यात्री को दी जाने वाली 83 हजार रुपए की सब्सिडी शामिल है। गत वर्ष सब्सिडी की धनराशि केंद्र ने प्रति हज यात्री 73 हजार रुपए दी थी। इस साल विमान भाड़ा बढ़ जाने के कारण इसमें वृद्धि करनी पड़ी है। इस साल हज का यात्रा भाड़ा एक लाख था जिसमें से हाजियों से प्रति यात्री सिर्फ 16 हजार ही वसूले गए, शेष धनराशि सरकारी कोष से दी गई।
उच्चतम न्यायालय एवं संसदीय समितियां इस सब्सिडी को बंद करने का केंद्र सरकार को एक दर्जन बार निर्देश दे चुकी हैं मगर भारत सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
विश्व भर में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां पर हज यात्रा के लिए सब्सिडी दी जाती है।
किसी भी मुस्लिम देश में कोई भी सब्सिडी हाजियों को नहीं दी जाती।
पाकिस्तान हाजियों को सब्सिडी नहीं देता।
क्‍या यह सरकार के सेकुलरवादी स्वरूप के खिलाफ नहीं?
सरकार पाकिस्तान जाने वाले सिख यात्रियों या कटास राज की यात्रा और कैलाश मानसरोवर जाने वाले को एक पैसा भी सब्सिडी क्‍यों नहीं देती? क्‍या यह मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दू-सिखों के साथ भेदभाव नहीं। भारत का संविधान बिना धार्मिक भेदभाव के सभी नागरिकों को एक समान मानता है, तो फिर यह भेदभाव क्‍या संविधान का उल्लंघन नहीं?
हाजियों को सब्सिडी देने का सिलसिला 1950 से शुरू हुआ। जब सरकार ने मुंबई से जलयानों द्वारा हाजियों को सऊदी अरब ले जाने वाले ‘मुगल लाइन्स’ नामक शिपिंग कम्‍पनी का राष्ट्रीयकरण किया। तब सब्सिडी की धनराशि सिर्फ चार करोड़ ही थी। अब जलयानों द्वारा हज यात्रा सरकार ने बंद कर दी है मगर विमान यात्रियों को सब्सिडी देने का सिलसिला जारी है।
1990 तक हाजी मुंबई से हज पर जाते थे मगर अब 27 जगहों से विशेष विमान हज यात्रियों को लेकर जाते हैं। भारत सरकार सऊदी अरब में हाजियों के लिए ठहरने के अतिरिक्‍त फ्री चिकित्सा व्यवस्था भी करती है। आजादी से पूर्व निजाम हैदराबाद द्वारा हर वर्ष 5 हजार यात्रियों को सरकारी खर्च पर हज यात्रा के लिए भेजा जाता था। इसके अतिरिक्‍त देश की चौदह मुस्लिम रियासतों ने मक्‍का मदीना में राबात बना रखे थे, जहां पर हाजी मुफ्त ठहर सकते थे। अब यह व्यवस्था केन्द्र ने खत्म कर दी है।
हर वर्ष सरकार सारा खर्चा खुद दे कर 200-250 सरकार के करीबी मुस्लिम नेताओं को गुड-विल-मिशन के रूप में सऊदी अरब भिजवाती है। उच्चतम न्यायालय ने इसे न भेजने का सरकार को निर्देश दिया था, मगर यह सिलसिला अब भी जारी है। इस साल राज्य सभा के उप सभापति के. रहमान खान के नेतृत्व में सद्भावना मिशन भेजा गया था।
हज यात्रा की व्यवस्था करने के लिए केंद्र सरकार के विदेश विभाग की एक विशेष शाखा है जिसका प्रभारी संयुक्‍त सचिव दर्जे का वरिष्ठ अधिकारी होता है। इसके अतिरिक्‍त एक केन्द्रीय हज समिति है जिसका चेयरमैन सत्तारूढ़ दल का कोई नेता बनाया जाता है। इन दिनों इस कमेटी की अध्यक्ष कांग्रेस की महामंत्री मोहसिना किदवई हैं। इसके अतिरिक्‍त प्रत्येक राज्य में एक राज्य स्तर की हज समिति है। हर राज्य में हज मंजिल है जिसमें सऊदी अरब रवाना होने से पूर्व हाजियों एवं उनके परिवारजनों को सरकारी खर्च पर अतिथि के रूप में ठहराया जाता है। क्‍या यह सुविधा किसी हिंदू संप्रदाय से संबंध रखने वाले व्यक्ति को प्राप्त है?
भारतीय संविधान में हालांकि कानून की नजर में सभी नागरिक बराबर हैं मगर इस देश में विभिन्न धर्मावलम्बियों के लिए अलग-अलग कानून हैं। मुसलमानों के मामलों को तय करने के लिए शरियत अदालतें और दारूल कजा नामक उच्च स्तर की अदालतें हैं। इनमें मुसलमानों से सम्‍बन्धित मामले शरा मोहम्‍मदी की रोशनी में काजी तय करते हैं।
पंडित नेहरू की कृपा से 1952 में हिन्दू कोड बिल बनाया गया था,जिसमें तलाक की व्यवस्था की गई जो कि हिन्दू धर्म ग्रंथों के सर्वथा विपरीत थी। हाल में ही उच्चतम न्यायालय ने यह स्वीकार किया है कि भारतीय संसद ने आज तक जो कानून बनाए वह सिर्फ हिन्दू सम्‍प्रदाय तक ही सीमित थे। अन्य सम्‍प्रदायों के मामले में सरकार को कानून बनाने की हिम्‍मत नहीं हुई क्‍योंकि वह पर्सनल लॉ के मामले में काफी संवेदनशील हैं। सरकार उनके पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करने की हिम्‍मत नहीं करती।
उच्चतम न्यायालय कम से कम पांच बार और देश के विभिन्न उच्च न्यायालय एक दर्जन से अधिक बार देश के सभी वर्गों के लिए समान पर्सनल लॉ बनाने का निर्देश दे चुके हैं मगर सरकार के कानों पर आज तक जूं नहीं रेंगी क्‍योंकि उसे अल्पसं2यकों की नाराजगी का डर है।
शाहबानो केस में मुसलमानों के आक्रोश के कारण सरकार ने एक कानून बना डाला जिसके तहत यह तय किया गया कि मुसलमान महिलाओं को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत तलाक देने के बाद पत्नियों को गुजारा भत्ता देने की कोई जरूरत नहीं। तर्क यह दिया गया कि शरई कानूनों के अनुसार इदत पीरियड में सिर्फ तीन महीनों के लिए पति के लिए गुजारा भत्ता देना ही काफी है।
दिल्ली के शाही इमाम अब्‍दुल्ला बुखारी के खिलाफ देश भर की अदालतों ने 216 बार वारंट जारी किए थे मगर एक बार भी दिल्ली पुलिस को इन वारंटों को तामील कराने की हिम्‍मत नहीं हुई। साफ है कि शाही इमाम देश के कानून और संविधान से बहुत ऊंचे हैं।
संसद ने हाल में ही अनिवार्य शिक्षा कानून पारित किया था मगर मुस्लिम नेताओं के विरोध के कारण अब सरकार ने इस मामले में घुटने टेक दिए हैं। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्‍बल ने यह घोषणा की है कि यह क कानून मुस्लिम मदरसों पर लागू नहीं होगा। क्‍या यह कानून सिर्फ हिन्दुओं के लिए ही बनाया गया है?देश में दो करोड़ बंगलादेशी घुसपैठिए रह रहे हैं। गत दस वर्षों में इनमें से केवल दस हजार को ही विदेशी नागरिक करार देकर वापस बंगलादेश खदेड़ा गया। शेष बंगलादेशी इस देश में बिना बुलाए मेहमान होने के बावजूद मौज उड़ा रहे हैं।
हाल में ही मुरादाबाद के एक गांव में जब पुलिस एक अपराधी को पकडऩे के लिए गई तो गांव वालों ने उसकी गिरफ्तारी का विरोध किया और पुलिस पर हमला किया। बाद में स्थानीय मुसलमानों ने पुलिस पार्टी पर यह झूठा आरोप लगा दिया कि उन्होंने इस छापे के दौरान कुरान का अपमान किया है। उर्दू समाचारपत्रों ने इस मामले को खूब उछाला। उत्तर प्रदेश में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुए, जिनसे भयभीत होकर सरकार ने घुटने टेक दिए और दोषी ठहराए गए पुलिस अधिकारियों को निलम्बित कर दिया गया। क्‍या यही न्याय है?
एक बात हम सबके लिए विचारणीय है कि क्‍यों 75 प्रतिशत के बहुमत की अवहेलना करके उसे एक सम्‍प्रदाय की भूमिका निभाने के लिए लाचार किया जाता है और क्‍यों 18 प्रतिशत के आसपास की जनसंख्‍या वाले मुस्लिम अल्पमत तथा 2 प्रतिशत के आसपास के अल्पमत को भी राष्ट्रीय महत्व दिया जाता है। संसार के किसी भी देश में 75 प्रतिशत के बहुमत वाली जनसंख्‍या को साम्‍प्रदायिक नहीं माना जाता। वह तो अपने आप में एक स्वस्थ एवं सबल राष्ट्र होने की सामथ्र्य रखती है, परन्तु हमारे यहां यह इसीलिए होता है कि  बहुमत संगठित न होकर अलग-अलग पार्टियों को अपनी रुचि के अनुसार वोट देता है और मुस्लिम अल्पमत संगठित होकर हिन्दू के मुकाबले एक मुसलमान को वोट देकर उसे सफल बनाता है। मुसलमान के वोट किसी भी गैर मुसलमान को तब ही मिलते हैं जबकि मुसलमान चुनाव क्षेत्र में न हो।
मुस्लिम सम्‍प्रदाय वोट एक व्यक्ति या पार्टी को संगठित होकर डालता है, इसीलिए उसके वोट की कीमत आंकी जाती है। हिन्दुओं के वोट अब तक सेकुलर पार्टियों को ही मिलते रहे हैं और वह भी बंटकर, इसलिए उसके वोट का कोई महत्व नहीं रह जाता। हिन्दुओं में बहुत देर के बाद यह समझ आनी आरम्‍भ हुई है कि ये सेकुलर पार्टियां हिन्दुओं से वोट लेकर मुस्लिम साम्‍प्रदायिकता को पालपोस रही है, इसीलिए उनकी हर बात की महत्‍व होती है और हिन्दुओं की हर बात साम्‍प्रदायिक और देश विरोधी बन जाती है। उनकी यह जागरूकता ही इन सेकुलर पार्टियों का सिरदर्द है। अगर हिन्दुओं ने एकजुट होकर किसी भी हिन्दुत्वनिष्ठ पार्टी को वोट देकर राज्य सत्ता तक पहुंचा दिया फिर इसका क्‍या होगा?अब तक जो हिन्दू गलत प्रचार-साधनों, सत्ता बल और धनबल के द्वारा भरमाया जाता था वह अब शायद सम्‍भव नहीं रहा,इसीलिए ये सब सेकुलर पार्टियां हिन्दुत्वनिष्ठ नेताओं तथा पार्टियों के विरुद्ध अनर्गल प्रचार कर रही हैं। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे अंग्रेज तथा मुस्लिम लीग कांग्रेस को दिन-रात हिन्दू संस्था बताते थे,क्‍योंकि इसी में उनका स्वार्थ सधता था और कांग्रेस हिन्दू विरोध की सीमा तक जाकर भी अपने को राष्ट्रीय संस्था बताती थी।
इन शब्‍दों के साथ मैं इस लम्‍बी लेखमाला को विराम देना चाहता हूं। अफसोस 125 करोड़ का यह मुल्क आज एक मोहताज सा हो गया है। देशवासियों को प्राचीन गौरव और परम्‍पराओं को याद रखना होगा और देश के हिन्दुओं को निर्णायक जंग के लिए एकजुट होना होगा।’

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INDIA-RUSSIA, India
Researcher of Yog-Tantra with the help of Mercury. Working since 1988 in this field.Have own library n a good collection of mysterious things. you can send me e-mail at alon291@yahoo.com Занимаюсь изучением Тантра,йоги с помощью Меркурий. В этой области работаю с 1988 года. За это время собрал внушительную библиотеку и коллекцию магических вещей. Всегда рад общению: alon291@yahoo.com