Sunday, June 1, 2014



गणितीय विवेचन :— {एक और बड़ा खुलासा}
1. “साईं सच्चरित्र” लिखे जाने का कम से कम वर्ष सन 1926 !
2. बाबा 16 वर्ष में दिखे, 3 वर्ष रहे फिर 1 वर्ष गायब इस प्रकार 20 वर्ष की आयु में बाबा का शिर्डी पुनः आगमन व मृत्यु होने तक वही निवास !
साईं बाबा का जीवन काल 1838 से 1918 (80 वर्ष) तक था (अध्याय 10)
अर्थात बाबा 20 वर्ष के थे सन 1858 में !
इस किताब में जितनी भी बाबा की लीलाएं व चमत्कार लिखे गये है वे सभी 20 वर्ष के आयु के पश्चात के ही है , क्यू की 20 वर्ष की आयु में ही वे शिर्डी में मृत्यु होने तक रहे !
3. स्पष्ट है जो लीला बाबा ने सन 1858 से करनी प्रारंभ की वो लिखी गई इस किताब में सन 1926 में !
अर्थात (1926-1858) 68 वर्षों पश्चात !
अब जरा दिमाग, बुद्धि व अपने विवेक का प्रयोग करिये और सोचिये 68 वर्ष पुराणी घटनाओं को इस किताब में लिखा गया वो कितनी सही होंगी ?????
अब यदि ये माने की किताब लिखने वालों ने जो भी लिखा है वो सब आँखों देखा हाल है तो किताब लिखने
वालों की सन 1858 में आयु क्या होगी ???
ध्यान से समझे :–
1. जैसा की किताब लिखने वाले बहुत ही चतुर किस्म के लोग थे तभी उन्होंने इस किताब को उलझा कर रख दिया, बाबा के सन्दर्भ में जहाँ जहाँ उनकी आयु व लीला करने का सन लिखने की नोबत आयी वहां वहां उन्होंने बाते एक ही स्थान पर न लिख कर टुकड़ों में लिखी जैसे : बाबे के सर्वप्रथम देखे जाने की आयु लिखी 16 वर्ष पर सन नही लिखा —–> अध्याय 4 में
जीवन काल 1838 से 1918 लिखा —–>अध्याय 10 में
इस बिच बाबे के 3 वर्ष, आयु 16 से 19 को पूरा गायब ही कर दिया ! और बचपन पूरा अँधेरे में है
युवक –>व्यक्ति/फ़क़ीर–>युवक —>व्यक्ति/पुरुष
इस चतुराई से साफ है की वे(किताब लिखने वाले) 40 से 60 वर्ष के रहे होंगे सन 1926 में जब किताब लिखनी प्रारंभ की !
1. हम 40 वर्ष माने तो 1858 में वे(किताब लिखने वाले) पैदा भी नही हुए ! 1926-40=1886>1858
२. किताब लिखने वालों की आयु सन 1926 में 50 वर्ष माने तो भी वे 1858 में पैदा नही हुए !
३. 60 वर्ष माने तो भी पैदा नही हुए —-> 1926-60 = 1866 > 1858
4. 68 वर्ष माने तो किताब लिखने वाले जस्ट पैदा ही हुए थे जब बाबा 20 वर्ष के थे —> 1926-68=1858 (1858=1858)
ये तो संभव ही नही की किताब लिखने वाले सन 1858 में जन्मे और जन्म लेते ही बाबे की लीलाए देखि समझी और 1926 में किताब में लिख दी हो !
तो अब क्या करे ???
किताब लिखने वालों की आयु 68 वर्ष होने भी संभव नही, आयु बढ़ानी पड़ेगी !
माना किताब लिखने वाले बाबे की लीलाओं के समय (सन 1858 से आगे तक) थे 20 वर्ष के,
अर्थात बाबे की और किताब लिखने वालों की आयु सन 1858 में 20वर्ष (एक बराबर) थी !
क्यू की कम से कम 20 वर्ष आयु लेनी ही पड़ेगी तभी उन्होंने 1858 में लीलाए देखि होंगी व समझी होंगी !
1. 1858 में 20 वर्ष के तो सन 1926 में हुए —-> 88 वर्ष के (कम से कम )
बाबा खुद ही 80 वर्ष में मर गये तो 88 वर्ष का व्यक्ति क्या जीवित होगा ??
यदि होगा तोभी 88 वर्ष की आयु में ये किताब लिखा जाना संभव ही नही, 88 वर्ष का व्यक्ति चार पाई पकड़ लेता है !
फिर में कह चूका हु की ये किताब लिखने का काम करने वाले चतुर जवान लोग थे !
लगभग 40 से 60 वर्ष के बिच के !
और इन आयु का व्यक्ति 1858 में पैदा भी नही हुआ !!…………………..झूठ नं 8
ये किताब पूरी एक महाधोखा है !
ये राजू के जन्म के पश्चात लिखी गई और कोरे झूठ ही झूठ है इसमें !
G.एक और झूठ :
फ़क़ीर से साधू बनाने का प्रयास :–
निम्न तस्वीर में बिच वाला साईं नही है ! बिच वाले व्यक्ति की तस्वीर , दाये-बाये (असली साईं) की जगह लेने का प्रयास कर रही है ! यदि ध्यान नही दिया गया तो असली साईं की तस्वीर बिच वाली तस्वीर से बदल दी जाएगी । क्योकि बिच वाले की सूरत भोली है !…………………………..झूठ नं 9 “Recently there appeared on some websites what was claimed to be a recently discovered photo of Shirdi Sai Baba.It is clearly a photo of that much revered Indian ‘saint’.”
बिच वाले बाबे के माथे पर बंधा कपडा भी नकली है ! गौर से देखें :- photo shop से एडिट किया हुआ है !
मेने नही किया है इस साईट पर उपलब्ध है :–
.एक और महाझूठ !!
साँईँ के चमत्कारिता के पाखंड और झूठ का पता चलता है, उसके “साँईँ चालिसा” से।
दोस्तोँ आईये पहले चालिसा का अर्थ जानलेते है:-
“हिन्दी पद्य की ऐसी विधा जिसमेँ चौपाईयोँ की संख्या मात्र 40 हो, चालिसा कहलाती है।”
सर्वप्रथम देखें की चोपाई क्या / कितनी बड़ी होती है ?
हनुमान चालीसा की प्रथम चोपाई :—
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥…1
ठीक है !!
अब साँईँ चालिसा की एक चोपाई देखें :–
पहले साईं के चरणों में, अपना शीश नवाऊँ मैं।
कैसे शिर्डी साईं आए, सारा हाल सुनाऊँ मैं।। (1)
उपरोक्त में प्रथम पंक्ति में एक कोमा (,) है अतः यदि पहली पंक्ति को (कोमे के पहले व बाद वाले भाग को) एक चोपाई माने तो चोपाईयों की संख्या हुई :– 204
और यदि दोनों पंक्तियों को एक चोपाई माने तो चोपाईयों की संख्या हुई :– 102
हनुमान चालीसा में पुरे 40 है आप यहाँ देख सकते है —>
http://www.vedicbharat.com/p/blog-page_6.htmlसाँईँ चालिसा में कुल 102 या 204 है …………………………………..झूठ नं 10
यहाँ देखें –>
तनिक विचारेँ क्या इतने चौपाईयोँ के होने पर भी उसे चालिसा कहा जा सकता है??
नहीँ न?…..
बिल्कुल सही समझा आप लोगोँ ने….
जब इन व्याकरणिक व आनुशासनिक नियमोँ से इतना से इतना खिलवाड़ है, तो साईँ केझूठे पाखंडवादी चमत्कारोँ की बात ही कुछ और है!
कितने शर्म की बात है कि आधुनिक विज्ञान के गुणोत्तर प्रगतिशिलता के बावजूद लोग साईँ जैसे महापाखंडियोँ के वशिभूत हो जा रहे हैँ॥
क्या इस भूमि की सनातनी संताने इतनी बुद्धिहीन हो गयी है कि जिसकी भी काल्पनिक महिमा के गपोड़े सुन ले उसी को भगवान और महान मानकर भेडॉ की तरह उसके पीछे चल देती है ?
इसमे हमारा नहीं आपका ही फायदा है …. श्रद्धा और अंधश्रद्धा में फर्क होता है,
श्रद्धालु बनो ….
भगवान को चुनो …

.बाबा फ़क़ीर अथवा धनि
1. बाबा की चरण पादुका स्थापित करने के लिए बम्बई के एक भक्त ने 25 रुपयों का मनीआर्डर भेजा । स्थापना में कुल 100 रूपये व्यय हुए जिसमे 75 रुपये चंदे द्वारा एकत्र हुए ! प्रथम पाच वर्षों तक कोठारे के निमित 2 रूपये मासिक भेजते रहे । स्टेशन से छडे ढोने और छप्पर बनाने का खर्च 7 रूपये 8 आने सगुण मेरु नायक ने दिए ! {अध्याय 5}
25 +75 =100
2 रु मासिक, 5 वर्षों तक = 120 रूपये
100 +120 =220 रूपये कुल
ये घटनाये 19वीं सदी की है उस समय लोगो की आय 2-3 रूपये प्रति माह हुआ करती थी ! तो 220 रूपये कितनी बड़ी रकम हुई ??
उस समय के लोग 2-3 रूपये प्रति माह में अपना जीवन ठीक ठाक व्यतीत करते थे !
और आज के 10,000 रूपये प्रति माह में अपना जीवन ठीक ठाक व्यतीत करते है !
तो उस समय और आज के समय में रुपयों का अनुपात (Ratio) क्या हुआ ?
10000/3=3333.33
तो उस समय के 220 रूपये आज के कितने के बराबर हुए ?
220*3333.33=733332.6 रूपये (7 लाख 33 हजार रूपये)
यदि हम यह अनुपात 3333.33 की अपेक्षा कम से कम 1000 भी माने तो :-
उस समय के 220 रूपये अर्थात आज के कम से कम 2,20000 (2 लाख 20 हजार रूपये) {अनुपात=1000 }
इतने रूपये एकत्र हो गये ?
मस्त गप्पे है इस किताब में तो !
2. बाबा का दान विलक्षण था ! दक्षिणा के रूप में जो धन एकत्र होता था उसमें से वे किसी को 20, किसी को 15 व किसी को 50 रूपये प्रतिदिन वितरित कर देते थे ! {अध्याय 7 }
3. बाबा हाजी के पास गये और अपने पास से 55 रूपये निकाल कर हाजी को दे दिए ! {अध्याय 11 }
4. बाबा ने प्रो.सी.के. नारके से 15 रूपये दक्षिणा मांगी, एक अन्य घटना में उन्होंने श्रीमती आर. ए. तर्खड से 6 रूपये दक्षिणा मांगी {अध्याय 14 }
5 . उन्होंने जब महासमाधि ली तो 10 वर्ष तक हजारों रूपये दक्षिणा मिलने पर भी उनके पास स्वल्प राशी ही शेष थी । {अध्याय 14 }
यहाँ हजारों रूपये को कम से कम 1000 रूपये भी माने तो आप सोच सकते है कितनी बड़ी राशी थी ये ?
उस समय के 1000 अर्थात आज के 10 लाख रूपये कम से कम ! {अनुपात =1000 }
6 . बाबा ने आज्ञा दी की शामा के यहाँ जाओ और कुछ समय वर्तालाब कर 15 रूपये दक्षिणा ले आओ ! {अध्याय 18 }
7 बाबा के पास जो दक्षिणा एकत्र होती थी, उनमे से वे 50 रूपये प्रतिदिन बड़े बाबा को दे दिया करते थे !
{अध्याय 23 }
8 . प्रतिदिन दक्षिणा में बाबा के पास बहुत रूपये इक्कठे हो जाया करते थे, इन रुपयों में से वे किसी को 1, किसी को 2 से 5, किसी को 6, इसी प्रकार 10 से 20 और 50 रूपये तक वो अपने भक्तों को दे दिया करते थे ! {अध्याय 29 }
9 . निम्न प्रति अध्याय 32 की है :
बाबा की कमाई = 2 (50+100 +150 ) = 600 रूपये
वाह !!
10 . बाबा ने काका से 15 रूपये दक्षिणा मांगी और कहा में यदि किसी से 1 रु. लेता हु तो 10 गुना लौटाया करता हु ! (अध्याय 35 )
11 . इन शब्दों को सुन कर श्री ठक्कर ने भी बाबा को 15 रूपये भेंट किये (अध्याय 35 )
12 . गोवा से दो व्यक्ति आए और बाबा ने एक से 15रूपये दक्षिणा मांगी !(अध्याय 36 )
13 . पति पत्नी दोनों ने बाबा को प्रणाम किया और पति ने बाबा को 500 रूपये भेंट किये जो बाबा के घोड़े श्याम कर्ण के लिए छत बनाने के काम आये ! (अध्याय ३ ६ )
बाबा के पास घोडा भी था ? 
ये कोन लोग थे जो बाबा को इतनी दक्षिणा दिए जा रहे थे !
दोस्तों आप स्वयं ही निर्णय ले ये क्या चक्कर है ?? में तो हेरान हु !
J. बाबे की जिद
14 अक्तूबर, 1918 को बाबा ने उन लोगो को भोजन कर लौटने को कहा ! लक्ष्मी बाई सिंदे को बाबा ने 9 रूपये देकर कहा “मुझे अब मस्जिद में अच्छा नही लगता ” इसलिए मुझे अब बूंटी के पत्थर वाडे में ले चलो, जहाँ में सुख पूर्वक रहूँगा” इन्ही शब्दों के साथ बाबा ने अंतिम श्वास छोड़ दी ! {अध्याय 43 }
1886 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन बाबा को दमा से अधिक पीड़ा हुई और उन्होंने अपने भगत म्हालसापति को कहा तुम मेरे शरीर की तिन दिन तक रक्षा करना यदि में वापस लौट आया तो ठीक, नही तो मुझे उस स्थान (एक स्थान को इंगित करते हुए) पर मेरी समाधी बना देना और दो ध्वजाएं चिन्ह रूप में फेहरा देना ! {अध्याय 43}
जब बाबा सन 1886 में मरने की हालत में थे तब तथा सन 1918 में भी, बाबे की केवल एक ही इच्छा थी मुझे तो बस मंदिर में ही दफ़न करना !
1918-1886 = 32 वर्षों से अर्थात 48 वर्ष की आयु से बाबा के दिमाग में ये चाय बन रही थी !
K. जीवन में अधिकतर बीमार व मृत्य बीमारी से !!
बाबा की स्थति चिंता जनक हो गई और ऐसा दिखने लगा की वे अब देह त्याग देंगे ! {अध्याय ३९}
1886 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन बाबा को दमा से अधिक पीड़ा हुई और उन्होंने अपने भगत म्हालसापति को कहा तुम मेरे शरीर की तिन दिन तक रक्षा करना यदि में वापस लौट आया तो ठीक, नही तो मुझे उस स्थान (एक स्थान को इंगित करते हुए) पर मेरी समाधी बना देना और दो ध्वजाएं चिन्ह रूप में फेहरा देना ! {अध्याय 43}
1. बाबे को 1886 अर्थात 48 वर्ष की आयु में दमे की शिकायत हुई !
थापना में कुल 100 रूपये व्यय हुए =1,00,000 (1 लाख रूपये)
“बाबा समाधिस्त हो गये ” – यह ह्रदय विदारक दुख्संवाद सुन सब मस्जिद की और दोड़े {अध्याय 43}
स्पष्ट है बाबे ने मस्जिद में दम तोडा !
लोगो में बाबा के शरीर को लेकर मतभेद हो गया की क्या किया जाये और यह ३ ६ घंटों तक चलता रहा {अध्याय ४ ३ }
इस किताब में बार बार समाधी/महासमाधी/समाधिस्त शब्द आया है किन्तु बाबा की मृत्यु दमे व बुखार से हुई ! बाद में दफन किया गया अतः उस स्थान को समाधी नही कब्र कहा जायेगा !!
और क्रब्रों को पूजने वोलों के लिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता जी में क्या कहा है आगे देखने को मिलेगा !
समाधी स्वइच्छा देहत्याग को कहते है !
3 दिनों पुरानी लाश को बाद में मंदिर में दफन किया गया !
बाबा का शरीर अब वहीँ विश्रांति पा रहा है , और फ़िलहाल वह समाधी मंदिर नाम से विख्यात है {अध्याय 4}
“बाबा का शरीर अब वहीँ विश्रांति पा रहा है” — स्पष्ट है इसे दफन ही किया गया !
जहाँ उसे दफ़न किया गया वो मंदिर था किस का ?
भगवान श्री कृष्ण का !
बुधवार संध्या को बाबा का पवित्र शरीर बड़ी धूमधाम से लाया गया और विधिपूर्वक उस स्थान पर समाधी बना दी गई ! सच तो ये है की बाबा ‘मुरलीधर’ बन गये और समाधी मंदिर एक पवित्र देव स्थान ! {अध्याय ४३ }
श्री कृष्ण के मंदिर में इस सड़ी लाश को गाडा गया !! और पूज दिया गया !
कई साईं भक्तों का ये भी कहना है की बाबा ने कभी भी स्वयं को भगवान नही कहा, तो आईये उनके मतिभ्रम का भी समाधान करते है :-
निम्न प्रति साईं सत्चरित्र अध्याय 3 की है :-
इस पुस्तक में और भी पचासों जगह बाबा ने स्वयं को ईश्वर कहा है !
हम केवल यह एक ही उदहारण दे रहे है !
ये हाल है दोस्तों :– करोडो भारतियों की आस्था के साथ बलात्कार किया गया है एक बार नही बारम्बार !!!
जिन्हें ईश्वर ने जरा सी भी बुद्धि दी है वो तो उपरोक्त वर्णन से ही समझ चुके होंगे !
शिर्डी वाले का भांडा फूटते ही —-> सत्य साईं का अपने आप ही फुट गया क्यू की सत्य साईं उसी का अवतार था !
—->दोस्तों साईं और सत्य साईं की पोल पूरी खुल ही चुकी है परन्तु हमारे करोडो भाई-बहिनों-माताओं आदि के ह्रदय में इनका जहर घोला गया वो उतरना अति अति आवश्यक है !
इसलिए आगे बढ़ते है और अभी भी मात्र लोगोको सत्य दिखने के लिए इसे(शिर्डी वाले को) चमत्कारी ही मान कर चलते है !
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साईं बाबा का जीवन काल 1838 से 1918 (80 वर्ष) तक था (अध्याय 10 ) , उनके जीवन काल के मध्य हुई घटनाये जो मन में शंकाएं पैदा करती हैं की क्या वो सच में भगवान थे , क्या वो सच में लोगो का दुःख दूर कर सकते है?


मित्रो आज हम आपके सामने साईं का एक और इस्लामिक चेहरा बेनकाब कर रहे है जिससे पता चलता है की साईं न केवल खुद इस्लामिक प्रचार प्रसार में शामिल था बल्कि वह दुसरे मुसलमानों को भी ऐसा करने के लिए प्रत्साहित या उनका बचाव करता था | आज हम रोहिल्ला की घटना आपके सामने रख रहे है जो अध्याय 4 से है जिसमे रोहिल्ला की ऊँची आवाज में अजान से शिर्डी वासी दुखी थे पर साईं ने कभी एक शब्द रोहिल्ला के विरुद्ध नहीं कहे,
रोहिला की कथा
यह कथा श्री साई बाबा के समस्त प्राणियों पर समान प्रेम की सूचक है । एक समय रोहिला जाति का एक मनुष्य शिरडी आया । वह ऊँचा-पूरा, सुदृढ़ एवं सुगठित शरीर का था । बाबा के प्रेम से मुग्ध होकर वह शिरडी में ही रहने लगा । वह आठों प्रहर अपनी उच्च और कर्कश ध्वनि में कुरान शरीफ के कलमे पढ़ता और अल्लाहो अकबर के नारे लगाता था । शिरडी के अधिकांश लोग खेतों में दिन भर काम करने के पश्चात जब रात्रि में घर लौटते तो रोहिला की कर्कश पुकारें उनका स्वागत करती है । इस कारण उन्हें रात्रि में विश्राम न मिलता था, जिससे वे अधिक कष्ट असहनीय हो गया, तब उन्होंने बाबा के समीप जाकर रोहिला को मना कर इस उत्पात को रोकने की प्रार्थना की । बाबा ने उन लोगों की इस प्रार्थना पर ध्यान न दिया । इसके विपरीत गाँववालों को आड़े हाथों लेते हुये बोले कि वे अपने कार्य पर ही ध्यान दें और रोहिला की ओर ध्यान न दें । बाबा ने उनसे कहा कि रोहिला की पत्नी बुरे स्वभाव की है और वह रोहिला को तथा मुझे अधिक कष्ट पहुंचाती है, परंतु वह उसके कलमों के समक्ष उपस्थित होने का साहस करने में असमर्थ है और इसी कारण वह शांति और सुख में है । यथार्थ में रोहिला की कोई पत्नी न थी । बाबा के संकेत केवल कुविचारों की ओर था । अन्य विषयों की अपेक्षा बाबा प्रार्थना और ईश-आराधना को महत्तव देते थे । अतः उन्होंने रोहिला के पक्ष का समर्थन कर, ग्रामवासियों को शांतिपूर्वक थोड़े समय तक उत्पात सहन करने का परामर्श दिया ।

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INDIA-RUSSIA, India
Researcher of Yog-Tantra with the help of Mercury. Working since 1988 in this field.Have own library n a good collection of mysterious things. you can send me e-mail at alon291@yahoo.com Занимаюсь изучением Тантра,йоги с помощью Меркурий. В этой области работаю с 1988 года. За это время собрал внушительную библиотеку и коллекцию магических вещей. Всегда рад общению: alon291@yahoo.com