Tuesday, June 24, 2014




पुरी में जगन्नाथ मंदिर केे कुछ आश्चर्यजनक तथ्य:-
1. मन्दिर के ऊपर स्थापित ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है।
2. पुरी में किसी भी स्थान से आप मन्दिर के ऊपर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह
आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा।
3. सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है, और शाम के दौरान
इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है ।
4. पक्षी या विमानों को मंदिर के ऊपर उड़ते हुए नहीं पायेगें।
5. मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है ।
6. मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है।
प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती,चाहे हजार लोगों से 20 लाख लोगों
को खिला सकते हैं ।
7. मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखा जाता है और
सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है ।
इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक
के बाद एक पकती जाती है।
8. मन्दिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर के अंदर से) आप
सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते,आप (मंदिर के बाहर से)
एक ही कदम को पार करें जब आप इसे सुन सकते हैं,इसे शाम को स्पष्ट रूप से
अनुभव किया जा सकता है।
साथ में यह भी जाने:-
-----------------
मन्दिर का रसोईघर दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर है।
प्रति दिन सांयकाल मन्दिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़ कर
बदला जाता है।
मन्दिर का क्षेत्रफल चार लाख वर्ग फिट में है।
मन्दिर की ऊंचाई 214 फिट है।
विशाल रसोई घर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने वाले महाप्रसाद का निर्माण करने
हेतु 500 रसोईये एवं उनके 300 सहायक-सहयोगी एक साथ काम करते है।
हमारे पूर्वज कितने बढे इंजीनियर रहें होंगे !!
अपनी भाषा अपनी सनातन संस्कृति अपनी सभ्यता पर गर्व करो
गर्व से कहो हम हिंदू है।
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,जयति पुण्य भूमि भारत,,,
सदा सुमंगल,,,वंदेमातरम,,,
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
संस्कृत(sanskrat) को मृत भाषा कहने वाले अपनी माँ को गाली दे रहे हैं
देवभाषा संस्कृत की गूंज कुछ साल बाद अंतरिक्ष में सुनाई देगी । इसके वैज्ञानिक पहलू जानकर अमेरिका नासा की भाषा बनाने की कसरत में जुटा हुआ है । इस प्रोजेक्ट पर भारतीय संस्कृत विद्वानों के इन्कार के बाद अमेरिका अपनी नई पीढ़ी को इस भाषा में पारंगत करने में जुट गया है।
गत दिनों आगरा दौरे पर आए अरविंद फाउंडेशन [इंडियन कल्चर] पांडिचेरी के निदेशक संपदानंद मिश्रा ने 'जागरण' से बातचीत में यह रहस्योद्घाटन किया कि नासा के वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स ने 1985 में भारत से संस्कृत के एक हजार प्रकांड विद्वानों को बुलाया था। उन्हें नासा में नौकरी का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने बताया कि संस्कृत ऐसी प्राकृतिक भाषा है, जिसमें सूत्र के रूप में कंप्यूटर के जरिए कोई भी संदेश कम से कम शब्दों में भेजा जा सकता है। विदेशी उपयोग में अपनी भाषा की मदद देने से उन विद्वानों ने इन्कार कर दिया था।
इसके बाद कई अन्य वैज्ञानिक पहलू समझते हुए अमेरिका ने वहां नर्सरी क्लास से ही बच्चों को संस्कृत की शिक्षा शुरू कर दी है। नासा के 'मिशन संस्कृत' की पुष्टि उसकी वेबसाइट भी करती है। उसमें स्पष्ट लिखा है कि 20 साल से नासा संस्कृत पर काफी पैसा और मेहनत कर चुकी है। साथ ही इसके कंप्यूटर प्रयोग के लिए सर्वश्रेष्ठ भाषा का भी उल्लेख है।
संस्कृत के बारे में आज की पीढ़ी के लिए आश्चर्यजनक तथ्य -------------
1. कंप्यूटर में इस्तेमाल के लिए सबसे अच्छी भाषा।
संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1987
2. सबसे अच्छे प्रकार का कैलेंडर जो इस्तेमाल किया जा रहा है, हिंदू कैलेंडर है (जिसमें नया साल सौर प्रणाली के भूवैज्ञानिक परिवर्तन के साथ शुरू होता है)
संदर्भ: जर्मन स्टेट यूनिवर्सिटी
3. दवा के लिए सबसे उपयोगी भाषा अर्थात संस्कृत में बात करने से व्यक्ति स्वस्थ और बीपी, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल आदि जैसे रोग से मुक्त हो जाएगा। संस्कृत में बात करने से मानव शरीर का तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है जिससे कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश(Positive Charges) के साथ सक्रिय हो जाता है।
संदर्भ: अमेरीकन हिन्दू यूनिवर्सिटी (शोध के बाद)
4. संस्कृत वह भाषा है जो अपनी पुस्तकों वेद, उपनिषदों, श्रुति, स्मृति, पुराणों, महाभारत, रामायण आदि में सबसे उन्नत प्रौद्योगिकी(Technology) रखती है।
संदर्भ: रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी, नासा आदि
(नासा के पास 60,000 ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियों है जो वे अध्ययन का उपयोग कर रहे हैं)
(असत्यापित रिपोर्ट का कहना है कि रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं। दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्तकरने के लिए है, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय इंडिया (भारत) में नहीं है।
5. दुनिया की सभी भाषाओं की माँ संस्कृत है। सभी भाषाएँ (97%) प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस भाषा से प्रभावित है।
संदर्भ: यूएनओ
6. नासा वैज्ञानिक द्वारा एक रिपोर्ट है कि अमेरिका 6 और 7 वीं पीढ़ी के सुपर कंप्यूटर संस्कृत भाषा पर आधारित बना रहा है जिससे सुपर कंप्यूटर अपनी अधिकतम सीमा तक उपयोग किया जा सके।
परियोजना की समय सीमा 2025 (6 पीढ़ी के लिए) और 2034 (7 वीं पीढ़ी के लिए) है, इसके बाद दुनिया भर में संस्कृत सीखने के लिए एक भाषा क्रांति होगी।
7. दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है।
संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1985
8. संस्कृत भाषा वर्तमान में "उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी" तकनीक में इस्तेमाल की जा रही है। (वर्तमान में, उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी तकनीक सिर्फ रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में ही मौजूद हैं। भारत के पास आज "सरल किर्लियन फोटोग्राफी" भी नहीं है )
9. अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया वर्तमान में भरतनाट्यम और नटराज के महत्व के बारे में शोध कर रहे हैं। (नटराज शिव जी का कॉस्मिक नृत्य है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सामने शिव या नटराज की एक मूर्ति है )
10. ब्रिटेन वर्तमान में हमारे श्री चक्र पर आधारित एक रक्षा प्रणाली पर शोध कर रहा है।
लेकिन यहाँ यह बात अवश्य सोचने की है,की आज जहाँ पूरे विश्व में संस्कृत पर शोध चल रहे हैं,रिसर्च हो रहीं हैं वहीँ हमारे देश के लुच्चे नेता संस्कृत को मृत भाषा बताने में बाज नहीं आ रहे हैं अभी ३ वर्ष पहले हमारा एक केन्द्रीय मंत्री बी. एच .यू . में गया था तब उसने वहां पर संस्कृत को मृत भाषा बताया था. यह बात कहकर वह अपनी माँ को गाली दे गया, और ये वही लोग हैं जो भारत की संस्कृति को समाप्त करने के लिए यहाँ की जनता पर अंग्रेजी और उर्दू को जबरदस्ती थोप रहे हैं.
संस्कृत को सिर्फ धर्म-कर्म की भाषा नहीं समझना चाहिए-यह लौकिक प्रयोजनों की भी भाषा है. संस्कृत में अद्भुत कविताएं लिखी गई हैं, चिकित्सा, गणित, ज्योतिर्विज्ञान, व्याकरण, दशर्न आदि की महत्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हैं. केवल आध्यात्मिक चिंतन ही नहीं है, बल्कि दाशर्निक ग्रंथ भी उपलब्ध हैं,किन्तु रामायण,और गीता की भाषा को आज भारत में केवल हंसी मजाक की भाषा बनाकर रख दिया गया है,भारतीय फिल्मे हों या टी.वी. प्रोग्राम ,उनमे जोकरों को संस्कृत के ऐसे ऐसे शब्द बनाकर लोगों को हँसाने की कोशिश की जाती है जो संस्कृत के होते ही नहीं हैं, और हमारी नई पीढी जिसे संस्कृत से लगातार दूर किया जा रहा है,वो संस्कृत की महिमा को जाने बिना ही उन कॉमेडी सीनों पर दात दिखाती है.
अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में नर्सरी से ही बच्चों को संस्कृत पढ़ाई जाने लगी है, कहीं एसा न हो की हमारी संस्कृत कल वैश्विक भाषा बन जाये और हमारे नवयुवक संस्कृत को केवल भोंडे और भद्दे मसखरों के भाषा समझते रहें. अपने इस लेख से मै भारत के यूवाओं को आह्वान करता हूँ की आने वाले समय में संस्कृत कम्पुटर की भाषा बन्ने जा रही है ,सन २०२५ तक नासा ने संस्कृत में कार्य करने का लक्ष्य रखा है. अतः अंग्रेजी भाषा के साथ साथ वे अपने बच्चों को संस्कृत का ज्ञान जरूर दिलाएं ,और संस्कृत भाषा को भारत में उपहास का कारन न बनाये ,क्यों की संस्कृत हमारी देव भाषा है ,संस्कृत का उपहास करके हम अपनी जननी का उपहास करते हैं.
क्या 'हिन्दू' नाम विदेशियों ने दिया?
विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है हिन्दू धर्म। सिर्फ 5 हजार वर्ष पहले तक कोई दूसरा धर्म अस्तित्व में नहीं था तो स्वाभाविक है कि हिन्दुओं में कभी यह खयाल नहीं आया कि कोई नया धर्म जन्म लेगा और फिर वह हमें मिटाने के लिए सबकुछ करेगा। मात्र 2 हजार वर्ष पूर्व ईसाई धर्म की उत्पत्ति के पहले तक भी धार्मिक झगड़े या धर्मांतरण जैसा कोई माहौल नहीं था। धर्म के लिए युद्ध नहीं होते थे।
सवाल 'हिन्दू' शब्द के संदर्भ में कि कुछ विदेशी लेखक यह मानते हैं कि 'हिन्दू' नाम का कोई धर्म नहीं है...धर्मशास्त्र पढ़ा रहीं शिकागो यूनिवर्सिटी की वेंडी डोनिगर की किताब 'हिन्दूज : एन आल्टरनेटिव हिस्ट्रीज़' (हिन्दुओं का वैकल्पिक इतिहास) इसका ताजा उदाहरण है। इस किताब में जो लिखा गया है वह भारत के सामाजिक ताने-बाने को विखंडित करता है। खैर, ऐसे कई अंग्रेज लेखक हैं जिसका अनुसरण हमारे यहां के इतिहासकार करते आए हैं। सचमुच देश और विदेश के ज्यादातर लेखक पढ़ते कम और लिखते अधिक हैं और लिखने के पीछे उनकी मंशा क्या होती है ये तो वही जाने।
हिन्दुओं को ही आर्य, वैदिक और सनातनी कहा गया है, उसी तरह जिस तरह कि अन्य धर्म के लोगों को भी 3-4 नामों से पुकारा जाता है। दुष्प्रचार के कारण कुछ लोग खुद को 'हिन्दू' न कहकर आर्य समाजी कहते हैं, कुछ लोग सनातनी और कुछ खुद को संत मत का मानते हैं।
लेकिन भारतीय लेखक या इतिहासकार दो-चार किताबें पढ़कर अपनी धारणा बना लेते हैं और वे भी षड्‍यंत्रकारियों की साजिश का शिकार होते रहे हैं। लेकिन वे यदि जान-बूझकर ऐसा कर रहे हैं तो फिर सोचना होगा कि वे भारतीय है या नहीं?
* क्या 'हिन्दू' शब्द की उत्पत्ति सिन्धु के कारण नहीं हुई?
* क्या सिन्धु नदी के आसपास रहने वालों को ईरानियों ने 'हिन्दू' कहना शुरू किया, क्योंकि उनकी जुबान से 'स' का उच्चारण नहीं होता था?
* क्या 'हिन्दू' शब्द विदेशियों द्वारा दिया गया शब्द है?
* क्या 'इन्दु' शब्द से 'हिन्दू' शब्द बना?
* क्या प्राचीनकाल से ही 'हिन्दू' शब्द प्रचलित था?
सिन्धु' से बना 'हिन्दू' : सवाल यह कि 'हिन्दू' शब्द 'सिन्धु' से कैसे बना? भारत में बहती थी एक नदी जिसे सिन्धु कहा जाता है। भारत विभाजन के बाद अब वह पाकिस्तान का हिस्सा है। ऋग्वेद में सप्त सिन्धु का उल्लेख मिलता है। वह भूमि जहां आर्य रहते थे। भाषाविदों के अनुसार हिन्द-आर्य भाषाओं की 'स्' ध्वनि (संस्कृत का व्यंजन 'स्') ईरानी भाषाओं की 'ह्' ध्वनि में बदल जाती है इसलिए सप्त सिन्धु अवेस्तन भाषा (पारसियों की धर्मभाषा) में जाकर हफ्त हिन्दू में परिवर्तित हो गया (अवेस्ता : वेंदीदाद, फर्गर्द 1.18)। इसके बाद ईरानियों ने सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वालों को 'हिन्दू' नाम दिया। ईरान के पतन के बाद जब अरब से मुस्लिम हमलावर भारत में आए तो उन्होंने भारत के मूल धर्मावलंबियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया। इस तरह हिन्दुओं को 'हिन्दू' शब्द मिला।
लेकिन क्या यह सही है कि हिन्दुओं को हिन्दू नाम दिया ईरानियों और अरबों ने?
पारसी धर्म की स्थापना आर्यों की एक शाखा ने 700 ईसा पूर्व की थी। मात्र 700 ईसापूर्व? बाद में इस धर्म को संगठित रूप दिया जरथुस्त्र ने। इस धर्म के संस्थापक थे अत्रि कुल के लोग। यदि पारसियों को 'स्' के उच्चारण में दिक्कत होती तो वे सिन्धु नदी को भी हिन्दू नदी ही कहते और पाकिस्तान के सिंध प्रांत को भी हिन्द कहते और सि‍न्धियों को भी हिन्दू कहते। आज भी सिन्धु है और सिन्धी भी। दूसरी बात यह कि उनके अनुसार फिर तो संस्कृत का नाम भी हंस्कृत होना चाहिए। सबसे बड़ा प्रमाण यह कि 'हिन्दू' शब्द का जिक्र पारसियों की किताब से पूर्व की किताबों में भी मिलता है। उस किताब का नाम है : 'बृहस्पति आगम'।
इन्दु से बना हिन्दू : चीनी यात्री ह्वेनसांग के समय में 'हिन्दू' शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि 'हिन्दू' शब्द 'इन्दु' जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है, से बना है। चीन में भी 'इन्दु' को 'इंतु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष चन्द्रमा को बहुत महत्व देता है। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इंतु' या 'हिन्दू' कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही 'हिन्दू' शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम पारसियों या मुसलमानों की देन नहीं है।
बृहस्पति आगम : इन दोनों सिद्धांतों में से पहले वाले प्राचीनकाल में नामकरण को इस आधार पर सही माना जा सकता है कि 'बृहस्पति आगम' सहित अन्य आगम ईरानी या अरबी सभ्यताओं से बहुत प्राचीनकाल में लिखा जा चुके थे। अतः उसमें 'हिन्दुस्थान' का उल्लेख होने से स्पष्ट है कि हिन्दू (या हिन्दुस्थान) नाम प्राचीन ऋषियों द्वारा दिया गया था न कि अरबों/ईरानियों द्वारा। यह नाम बाद में अरबों/ईरानियों द्वारा प्रयुक्त होने लगा।
एक श्लोक में कहा गया है:-
ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:
गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।
हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।
'ॐकार' जिसका मूल मंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है तथा हिंसा की जो निंदा करता है, वह हिन्दू है।
श्लोक : 'हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥'- (बृहस्पति आगम)
अर्थात : हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।
हिमालय से हिन्दू : एक अन्य विचार के अनुसार हिमालय के प्रथम अक्षर 'हि' एवं 'इन्दु' का अंतिम अक्षर 'न्दु'। इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना 'हिन्दू' और यह भू-भाग हिन्दुस्थान कहलाया। 'हिन्दू' शब्द उस समय धर्म की बजाय राष्ट्रीयता के रूप में प्रयुक्त होता था। चूंकि उस समय भारत में केवल वैदिक धर्म को ही मानने वाले लोग थे और तब तक अन्य किसी धर्म का उदय नहीं हुआ था इसलिए 'हिन्दू' शब्द सभी भारतीयों के लिए प्रयुक्त होता था। भारत में हिन्दुओं के बसने के कारण कालांतर में विदेशियों ने इस शब्द को धर्म के संदर्भ में प्रयोग करना शुरू कर दिया।
दरअसल, 'हिन्दू' नाम हजारों वर्षों से चला आ रहा है जिसके वेदों, संस्कृत व लौकिक साहित्य में व्यापक प्रमाण मिलते हैं। वस्तुतः यह नाम हमें विदेशियों ने नहीं दिया है। हिन्दू नाम पूर्णतया भारतीय है जिसका मूल वेदों का प्रसिद्ध ‘सिन्धु’ शब्द है और हर भारतीय को इस पर गर्व होना चाहिए।


क्या आर्य (हिन्दू) भारत में कहीं बाहर (विदेश) से आए हैं ?
प्रख्यात भारतविद् प्रो. सूर्यकान्त बाली ने अपने ग्रन्थ ‘भारत गाथा’ में इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण बातें लिखी हैं जिनका मैं अक्षरसः उल्लेख कर रहा हूँ—
‘भारतीय शैली के इतिहास के स्मृति में मनु तो हैं, जिन्होंने मानव जाति को मानव बनाया। हमारी स्मृति में प्रलय भी है, जिसमें से मनु ने हमारी जाति को उबारा। हमारी स्मृति में पृथु भी हैं, जिनके नाम पर इस धरती का नाम ‘पृथिवी’ पड़ा। हमारी स्मृति में प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र भरत भी हैं, जिनके नाम पर इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा। हमारे जहन में इतनी सारी स्मृतियाँ हैं। परन्तु हम किसी और देश से, बाहर से अपने देश भारतवर्ष में आये— यह हमारी स्मृति में कहीं नहीं है। हमारी स्मृति में देव भी हैं। हमारी स्मृति में असुर भी हैं। हमारी स्मृति में देवासुर संग्राम भी है। हमारी स्मृति में यक्ष भी हैं, किन्नर भी हैं और गन्धर्व भी हैं। परन्तु हमारी स्मृति में वे आर्य नहीं हैं, जिन्हें कहीं बाहर से यहाँ आक्रमणकारी में रूप में आया बताया जा रहा है। हमारी स्मृति में श्रेष्ठ के अर्थ में ‘आर्य’ शब्द है। दुराचारी के अर्थ में ‘अनार्य’ शब्द भी है। हमारी स्मृति में ‘पति’ अर्थ देनेवाला आर्य शब्द भी है; पर जातिवाची, नस्लवाची वह ‘आर्य’ शब्द हमारी स्मृति में कहीं है नहीं। जिस तरह से आर्य हमारे पूर्वज और कहीं बाहर से आये हुए बताए जा रहे हैं, वेद हों या ब्राह्मण-ग्रन्थ हों, आरण्यक-ग्रन्थ हों या उपनिषद्-ग्रन्थ हों, रामायण और महाभारत-जैसे प्रबन्धकाव्य (इतिहास-ग्रन्थ) हों या अठारह पुराण और अठारह उपपुराण हों, तमाम वैज्ञानिक साहित्य हो, समाजशास्त्रीय ग्रन्थ हों या ललित साहित्य हो, संस्कृत के ऐसे किसी भी ग्रन्थ में कोई एक परोक्ष, प्रत्यक्ष की तो बात ही क्या है, सन्दर्भ तक ऐसा नहीं जो हमारे बारे में कहता हो कि हम बाहर से आये। ब्राह्मण-परम्परा के तमाम ग्रन्थ हों या श्रमण अर्थात् जैन-बौद्ध परम्परा के कोई ग्रन्थ हों, ऐसी कोई स्मृति कहीं अंकित नहीं, जो हमारे बारे में कहती हो कि हम बाहर से आए। भारत का पाली, प्राकृत, अपभ्रंश या आधुनिक भारतीय भाषाओं में लिखा साहित्य हो, हमारे देश के किसी भी कोने में गाया जानेवाला कोई लोकगीत हो, कोई झूठी-सच्ची अफवाह, कोरी गप्प या कोई बकवास हो, कहीं भी यह अंकित नहीं कि यह देश हमारा नहीं और हम कहीं बाहर से आये हैं।’
यह सर्वविदित तथ्य प्रमाणित करता है कि पाश्चात्य विद्वानों एवं उनके प्रभाव से प्रभावित भारतीय विद्वानों ने भारतीय इतिहास के प्रति कितना बड़ा षड्यंत्र किया है। यह जो अभिशाप किया है उसका प्रायश्चित भी उन्हें अवश्य इस काल के क्रम में करना ही पड़ेगा। हमें प्रयत्नपूर्वक भारतीय इतिहास-पद्धति को प्रतिष्ठित करना ही पड़ेगा। अन्य मार्ग नहीं है।

Friday, June 20, 2014

अरब की प्राचीन वैदिक संस्कृति :

April 1, 2014 at 10:50am
अरब की प्राचीन वैदिक संस्कृति : लगभग 1400 साल पहले अरब में इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ, इससे पहले अरब के निवासी अपने पिछले 4000 साल के इतिहास को भूल चुके थे, और इस्लाम में इस काल को जिहालिया कहा गया है जिसका अर्थ है अन्धकार का युग, परन्तु ये जिहालिया का युग मुहम्मद के अनुयाइयो द्वारा फैलाया झूठ है, इस्लाम से पहले वहां पर वैदिक संस्कृति थी, हमारे विभाग ने इस पर एक नहीं हजारो प्रमाण इकट्ठे कर लिए है, और ये मुर्ख ये नहीं जानते की जब मुहम्मद के कहने पर वहां के सभी पुस्तकालय, देवालय, विद्यालय जला दिए तो इन्हें कैसे पता चला की वहां पर इस्लाम से पहले जाहिलिया का युग था, असल में मुहम्मद जो की भविष्यपुराण के अनुसार राक्षस था, ने राजा भोज के स्वपन में आकर कहा था की आपका सनातन धर्म सर्वोत्तम है पर मैं उसे पुरे संसार से समेट कर उसे पैशाचिक दारुण धर्म में परिवर्तित कर दूंगा, और वहां के लोग लिंग्विछेदी, दढ़ियल बिना मुछ के, ऊँची आवाज में चिल्लाने वाले(अजान), व्यभाचारी, कामुक और लुटेरे होंगे, इसलिए ये जहाँ भी जाते है अराजकता फैला देते है, खुद मुस्लिम देश भी दुखी है, इनके जिहालिया के युग का भांडा शायर ओ ओकुल में फूटता है, जिसमे लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा जी ने अरब में वैदिक संस्कृति को प्रमाणित किया है, “अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे। व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1। वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा। वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2। यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम। फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3। वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन। फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4। जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन। व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।” अर्थात- (1) हे भारत की पुण्यभूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। (2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। (3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनके अनुसार आचरण करो। (4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है। (5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता। अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ‘ शायर-ए-ओकुल’ के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है । ‘उमर-बिन-ए-हश्शाम’ की कविता नयी दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़ला मन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर काली स्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है - ” कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक । कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1। न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा । वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2। व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ । मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3। व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन । व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4। मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम । नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5। अर्थात् – (1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। (2) अदि अन्त में उसको पश्चाताप हो और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ? (3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्च पद को पा सकता है। (4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहाँ पहुँचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है। (5) वहाँ की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्श गुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है इसके बाद अरब में लगभग 400-600 ईसा पूर्व चक्रवर्ती महाराज चन्द्रगुप्त ने सनातन धर्म की स्थापना की, पर शको के आक्रमण के बाद यहाँ से भारत का नियंत्रण लगभग कट चूका था, अरब में तब घर घर में सनातनी देवी देवताओं की पूजा होती थी, शिक्षा के लिए विधिवत गुरुकुल थे, बड़े बड़े संग्रहालय और पुस्तकालय थे, वैदिक संस्कृति से ओतप्रोत अरब में चहुँ और सनातन धर्म का एकछत्र साम्राज्य था, इसी काम में शक्वाहन के नेतृत्व में पुन: अरब में सनातन संस्कृति की स्थापना हुई, महाभारत काल में कम्बोज के कुम्ब्ज राजा का वर्णन आता है, ठीक इसी प्रकार एक मितन्नी वंश का भी वर्णन आता है जो बाद में अरब की और पलायन कर गया था, अरब में लगभग 500 वर्ष तक मितन्नी वंश के राजाओं का शासन रहा जो की अहुर(असुर) वंश के थे, इनके नाम है: तुष्यरथ(दशरथ) असुर निराही II असुर दान I असुर नसिरपाल I असुर बानिपाल I 632 ईo के बाद यहाँ पर पैगम्बर मुहम्मद के रूप में इस्लाम की स्थापना हुई, इस्लाम की स्थापना के बाद अरब में व्यापक स्तर पर हिन्दुओ का नरसंहार हुआ, काबा में स्थित सभी मूर्तियों को मुहम्मद द्वारा तोड़ दिया गया, परन्तु इसके उपरान्त भी मुहम्मद ने काबा में हजरे-असवद नाम के एक काले पत्थर को वहां पर रहने दिया और आज हर मुसलमान हज के समय उसके दर्शन अवश्य करता है, असल में हजरे अस्वाद का हजरे हजर शब्द से बना है जो की हर का अपभ्रंश है, हर का अर्थ संस्कृत में शिव होता है और अस्वाद अश्वेत का ही अपभ्रंश है, चूँकि मुहम्मद के समय ये पत्थर सफ़ेद रंग का था जो की बाद में हज के समय आने वाले पापियों, दुराचारियो और व्यभाचारियो के द्वारा छुते रहने के कारण काला पड़ गया, मक्का में काबा में स्थित भगवान् शिव भी सोचते होंगे की प्रतिवर्ष हजारो पापी अपने पापो की क्षमा याचना के लिए मक्का में इस आशा से आते है की उस शिवलिंग को के दर्शन मात्र से उनके पाप मिट जायेंगे, यहाँ पर मुस्लीम बिना सिले २ कपडे लेते है एक पहन कर और दूसरा कंधे पर डाल कर काबा की घडी की उलटी दिशा में 7 परिक्रमा करते है, चूँकि मुहम्मद ने भविष्यपुराण के अनुसार पैशाचिक धर्म की स्थापना की थी, इसलिए नकारात्मक ऊर्जा को मुसलमानों में निरंतर भरे रखने के लिए वहां पर उलटी परिक्रमा का रिवाज रखा गया, अब इस्लाम पर थोडा और जानकारी, इस्लामिक मत के अनुसार क़यामत के बाद हजरत मूसा ने इस धरती को पुन: बसाया था, जिसकी कहानी कुछ कुछ मतस्य पुराण से मिलती है, मतस्य पुराण में प्रलय की कथा : मतस्य पुराण 11/38http://www.youtube.com/watch?v=VqUcfYFELBM ठीक इसी प्रकार इस्लाम का अर्धचन्द्र सनातन संस्कृति से लिया गया है, भगवान् शंकर की पूजा करने वाले अरब वासियों ने भगवान् शिव के मस्तक पर स्थित अर्धचन्द्र को इस्लाम में स्थान दिया, चुकी देखने वाले बात ये है की इस्लामिक शहादा के झंडे में और मुहम्मद के मक्का फतह के समय वाले झंडे में ऐसा कुछ नहीं है, ये केवल अन्य गैर अरबी देशो में है जो बाद में इस्लामिक देश बन गये, ये है वो फोटो : https://www.facebook.com/photo.php?fbid=604056549653374&set=a.357591870966511.80710.100001471046733&type=1&theater एकीश्वर का सिद्धांत भी सनातन धर्म से लिया गया है जहाँ पर देवी देवता और अवतार बहुत है पर इश्वर एक ही है, ॐ शिव, क्यूंकि शिव ही अजन्मा है, और जिस जमजम के कुएं की ये बात करते है एक शिवलिंग उसमे भी है जिसकी पूजा खजूर के पत्तो से होती है, इस प्रकार मक्का में एक नहीं, दो शिवलिंग है, अब बात आती है मक्का में एक और प्रमाणिक स्त्रोत की, सभी जानते है की भगवान् वामन ने बलि के 100 यज्ञो द्वारा इंद्र पद प्राप्त करने के प्रयास को विफल करते हुए उससे तीन पग भूमि ली और उसमे चराचर जगत को २ पग में नाप कर तीसरे पद में राजा बलि को भी अपने अधीन कर लिया, भगवान् वामन का ये तीसरा पग और कही नहीं, मक्का में ही पड़ा था, इसका प्रमाण है मक्का में काबा के ठीक बाहर रखा एक स्तम्भ, जो की इस्लामिक मान्यता के अनुसार अब्राहम का है, ये देखे : http://www.hajjumrahguide.com/muqamibrahim.jpg और यदि हम अब्राहम शब्द को देखे तो यह अ ब्रह्म बनता है, और श्री विष्णु जी ही परब्रह्मा है, इसका एक प्रमाण शास्त्रों में यहाँ मिलता है : http://www.hajjumrahguide.com/muqamibrahim.jpg एकं पदं ग्यायान्तु मक्कायान्तु द्वितीयं तृतीयं स्थापितं दिव्यम मुक्ताए शुक्लस्य सन्निधो - हरिहर क्षेत्रमहात्म्य7:6 अन्य प्रमाण : जब मुहम्मद ने काबा और मक्का के पास स्थिति सभी सनातनी प्रमाणों को नष्ट कर दिया तब उसके बाद उसका पश्चाताप करने के लिए मुहम्मद ने विधिवत सनातन विधि से काबा में मंदिर की स्थापना की, इसका एक प्रमाण है काबा का अष्टकोणीय वास्तु, इसमें एक चतुर्भुज के ऊपर दूसरा चतुर्भुज टेढ़ा करके मंदिर स्थापना होती है और प्रत्येक सनातन मंदिर में यही विधान है, ये देखे: काबा का अष्टकोणीय वास्तु :https://www.facebook.com/photo.php?fbid=604055559653473&set=a.357591870966511.80710.100001471046733&type=1&theater अरब में मिला एक पुराना दीपक - http://www.stephen-knapp.com/art_photo_twenty.htm अरब में मिली सरस्वती माता की प्रतिमा : http://www.stephen-knapp.com/art_photo_twentyone.htm ठीक इसी प्रकार जमजम गंगगंग का ही अपभ्रंश है, और अरब में किसी मुस्लिम के मरने पर उसके मुह में जमजम का पानी डाला जाता है ठीक उसी प्रकार जैसे हिन्दुओ के मुह में गंगाजल डाला जाता है, कहते है की मुहम्मद ने कालिदास द्वारा भस्म होने के बाद भविष्य पुराण के अनुसार राजा भोज के स्वप्न में आकर राक्षसी पैशाचिक धर्म की नींव रख कर सनातन धर्म का नाश करने की बात कही थी, इसी के फलस्वरूप कुरान में मुसलमानों को जिहाद का आदेश दिया, और हदीस बुखारी किताब २ के अनुसार इसका सबसे बड़ा शत्रु केवल भारत था, जिसे अरबी में हिन्द कहते है, भारत को ख़ास टारगेट करके ही मुहम्मद ने मुसलमानो को गजवा हिन्द के निर्देश दिए, इसके बाद इस्लाम धीरे धीरे अन्य देशो में फैला जैसे की मिस्र, जैसा की नाम से ही पता चलता है मिस्र एक सनातनी देश था जो की मिश्रा हिन्दुओ के नाम पर बना है, ठीक इसी प्रकार सीरिया का नाम सूर्य देश था जो कालांतर में सीरिया हो गया, मिस्र में लगभग 3000 सालो तक सनातन धर्म की पताका फहराई गयी थी, इसका प्रमाण है वहां पर लगभग 11 पीढ़ी तक राम नाम के शासको द्वारा शासन करना, जिनके नाम है: परमेश रामशेस रामशेस I रामशेस II रामशेस III रामशेस IV रामशेस V महान रामशेस VI रामशेस VII रामशेस VIII रामशेस IX रामशेस X इसके अतिरिक्त महान राजा फ़राओ अपने उदर(पेट) व् मस्तक पर एक तिलक लगाते थे जो की हुबहू गोस्वामी तुलसीदास जैसा था. http://s4.hubimg.com/u/1990239_f260.jpghttp://www.hindupedia.com/eng/images/thumb/b/b6/Goswami_Tulsidas-image.jpg/180px-Goswami_Tulsidas-image.jpg अत: ये कहना की इस्लाम एक धर्म है गलत है, 

Sunday, June 8, 2014

प्रोजेक्ट ब्लू बीम, शैतान का विश्वधर्म


नोटः सर्ज मोनेस्ट और अन्य एक पत्रकार "प्रोजेक्ट ब्लु बीम" के लिए रिसर्च कर रहे थे तो उन का एक ही सप्ताह में एक ही तरह के दिल के दौरे से मौत हो गयी थी, दोनों मे से किसी को दिल की बीमारी नही थी । सर्ज केनेडा में था और दुसरा केनेडियन आयर्नलेन्ड की विजिट पर था ।

उस की मौत से पहले केनेडियन सरकार ने उसे रिसर्च करते रोकने के लिए उसकी बेटी का अपहरण कर लिया था जो कभी वापस नही आयी थी ।

प्रोजेक्ट ब्लु बीम ने गुनाहित रित से दिल का नकली दौरा करवा दिया । 

प्रोजेक्ट ब्लु बीम किस लिए?

दुनिया के सभी मौजुदा पारंपरिक धर्मों को मिटाकर एक नये कोमन धर्म की स्थापना के लिए । राष्ट्रिय पहचान, राष्ट्रिय गौरव को समाप्त कर के वर्ल्ड प्राईड और वर्ल्ड पहचान बनाने के लिए ।

हम देख रहे हैं धर्म को मिटाने के लिए नास्तिक और सेक्युलर जनता की फौज खडी हो गयी है, नये नये धर्म गुरुओं की फौज खडी हो गयी है जो नकली हिन्दु बन के दानवों का ग्लोबल एजन्डा चला रहे हैं अपनी अपनी दुकान में बैठ कर । राष्टिय गौरव जैसा तो पिछले १०० साल से नही है, पहले था उसे वामपंथी इतिहासकार, बुध्धिजीवी लेखक और फिल्मकारों ने मिटा दिया है । 

इल्लुमिनीटी ने बडी सावधानी से योजनाबद्ध तरीके से हिन्दु धर्म सहित सभी धर्मों और भगवान से  विश्वासनष्ट कर दिया है/ नष्ट किया जा रहा है उस में कोइ शक है ? शैतान पंथी हम पर राज कर रहे हैं उस बात के सबूत देने की जरूरत है ?

सभी समाजिक रचना, पूरी कुटुंब व्यवस्था को मिटा कर मानव को सिर्फ व्यक्ति बना कर नयी बन वर्ल्ड वन गवर्नमेन्ट के गौवर के लिए काम पर लगाना ।
सभी व्यक्तिगत कला और विज्ञान की उपलब्धियों को भूला कर वन वर्ल्ड गवर्न्मेन्ट के लिए वन-माईन्डसेट को स्थापित करना ।

समाज रचना और कुटुंब प्रथा में क्या तकलिफ है ?

१९९२ में रसिया के टुकडे करनेवाले मिखाईल गार्बोचेव और इल्ल्युमिनिटी की एक संस्था "क्लब ओफ रोम" ने मिलकर युनो के लिए एक डॉक्युमेन्ट बनाया था "ध अर्थ चार्टर" । उस अर्थ चार्टर में मानव कल्याण के बारे में बहुत मिठा मिठा लिखा है लेकिन असल में उस डॉक्युमेन्ट के हिसाब से युनो के धन माफिया पूरी धरती के मालिक बन जाते हैं और धरती की प्रजा उस की प्रोपर्टी बन जाती है । उस डोक्युमेन्ट को दुनिया के देशों के पास साईन करने के लिए भी नही भेजा है क्यों कि चेलेन्ज होते ही अदालतों के चक्कर में फंसने का डर था । भारत के आधार कार्ड की तरह कोइ भी कानूनी मान्यता के बीना चलाया है और दुनिया के देशों में पिछले दरवाजे से लागू भी हो रहा है ।

दुनियाने असली साम्यवाद देखा नही है । वर्ल्ड गवर्नमेन्ट असली साम्यवादी होगी, साम्यवादी मानते हैं कि आदमी सिर्फ प्राणी है, जनसमुह भेंड की टोली है । ( वे पीपल को शीपल कहते हैं ) । लेकिन आदमी में धर्म और संस्कार है इसलिए आदर्ष भेंड नही बन सकता है, चेलेन्ज करता है, विद्रोह करता है, बराबर कंट्रोल नही हो रहा है ।

 जब आदमी जानवर है तो उसे समाज और कुटुंब की जरूरत नही । कुटुंब के कारण ही आदमी में धन की लालच जागती है । कुटुंब के कारण ही वो धन बचाता है, घरमें अनाज का संग्रह करता है । ये सब करप्शन है । ऐसे जन समुह को जीतना भारी पडता है । इस लिए कुटुम्ब प्रथा को तोड कर लिव इन रिलेशन और फ्री सेक्स, गे, लेस्बियन, एनिमल सेक्स जैसे अस्थायी विकल्पों की और आदमी को मोडा जा रहा है ।
   
 आदमी प्राणी है तो उसके पास प्रोपर्टी नही होनी चाहिए । एक जानवर के पास प्रोपर्टी कैसे हो सकती है ? साम्यवाद में प्रोपर्टी रखना मना है, सभी चीजें सरकारी होती है । इसी लिए तो भारत में नगरिकों की प्रोपर्टी छीनने के दाव खेले जा रहे हैं । एक प्यादे का गुट कहता है नागरिकों के पास कॅश धन रखने का अधिकार नही होना चाहिए, सारा धन मालिकों के बेंकों मे होना चाहीए । दुसरे प्यादे का ध्यान जमीन पर है । २५० स्केर फुट का घर ही आदमी को देना चाहता है, बडा हो तो प्रोपर्टी टेक्स की मार से छीन लेना चाहता है । नागरिक को अपनी दुकान या कारखाना चलाने का अधिकार नही है । दानवों ने अपनी कंपनियां खडी कर के दुनिया के देशों में भेजा है ताकी नागरिकों की दुकाने और कारखाने बंद कराया जा सके ।

नागरीक खूद सरकार की प्रोपर्टी है । आने वाले वैश्विक साम्यवाद में आदमी बच्चे का भी हक्कदार नही होगा । सरकार ही बच्चों की मालिक होगी, अपने हिसाब से पालन करेगी । उसकी निव डाली गयी हैं बच्चों को स्कूल में खाना खिलाकर । मांबाप को टेक्स और मेहंगाई और बेरोजगारी की मार से कमजोर कर के बच्चों पर वैसे ही दया नही दिखई है । नयी पिढी को सरकार की ऋणी बनाना है और माबाप से ज्याद सरकार ख्याल रखती है ऐसा एहसास दिलाना है ।

पृथ्वी पर स्थिरता पूर्वक शैतान राज चलाने के लिए, दुनिया की सरकारें मिटाई जा सकती है, अर्थतंत्र और करंसी का कबजा ले लिया जा सकता है पर विविधता भरे धर्म और विश्वास का क्या ? विश्वास प्रणालि चाहिए ही नहीं । लोगों को एक जैसे जानवर बना कर शैतान के पूजारी बनाना आसान है एकजुट करने के लिए ।


शैतानी की बूक ओफ रिविलेशन के १३.०७ में लिखा है "दुनिया की हर जनजाति, लोग, भाषा राष्ट्र पर शैतान का अधिकार होगा" ।  

प्रॉटोकोल ५.११ अनुसार इल्लुमिनेटी की योजना कहती हैं, " दुनिया के सभी राज्य के बलों को अवशोषित करना और एक सुपर सरकार बनाना " 

रिविलेशन १३.०८ " पृथ्वी के निवासी शैतानी जानवरों की पूजा करेंगे । "

एक कुत्ता अगर पिछे पडे तो भाग के किसी की दुकान में घुस जाने वाले हम पापड तोड शैतानी शेर की पूजा तो नही करते पर गर्व जरूर करते हैं कि "हमारे देश में शेर है !"
हमारे सनातनी पूरखे जीन को अधर्मि राक्षस समज कर मारते थे या सुधारते थे वो ही आज हम पर राज कर रहे हैं । हमारे पूरखें वाघ या शेर जैसे राक्षसी प्राणीयों का शिकार करते थे आज उन प्राणियों की रक्षा करनी पडती है, उन की सेवा में वन कर्मियों को रख्खा जाता है । खूद शेर जैसे राजा अशोक को गद्दार बौध्धों की मदद से बकरी बना दिया था और शैतानी जानवर शेर को उनका राजचिंन्ह बना दिया था । आज भी उन शैतानी जानवरों को राष्ट्रिय दरजा मिला है । हमारे नेताओं को इस बात का पता भी नही होगा की अंग्रेज जाते जाते इन जानवरों को क्यों देश के माथे पर मारते गये थे !

प्रोटोकॉल १५.२० "वे हमारे शासक को देवता मान कर स्तुति और गुणगान करेंगे और भक्ति के साथ हमारे शासक की निरंकुशता स्वीकार करेंगे । हमारे शासक ही ब्रह्मांड के वास्तविक धर्मगुरु, पोप, अंतरराष्ट्रीय चर्च के पैट्रिआर्क हो जाएगा ।"

धर्म तोडने की योजना

लंबी अवधि की रणनीति है:

(1 ) डिवाईड एन्ड रूल, धर्म को सेक्टर में विभाजन करो, एक ही धर्म में नये नये संप्रदाय पैदा करो; श्रध्धालुंओं के बीच संदेह पैदा करो ।

(2) धर्म की नीव पर ही हमला करो, श्रध्धावानों में शंकायें पैदा कर आपस में लडवा दो ।

(3 ) अंत में, असंन्तुष्टों के झुंड को अन्य धर्मों की तरफ ले जाओ । भारत में सभी धर्मों से निकले कचरे के लिए ईसाई धर्म अच्छा रिसायकलबीन है और नास्तिकता तो है ही ।

हम देखते हैं आज मूल धर्मों की अनेक ब्रान्च हो गयी है, टोटल मारते हैं तो चार हजार के उपर संप्रदाय है धरती पर ।

शैतानों ने भगवान का विश्वास और मानव होने के गर्व का खंडन करने के साधन रूप डार्विनवाद चलाया था । डार्विन नाम के फ्रॉड शेरबाजार के आदमी को नकली सायंटिस्ट बना दिया था ।

प्रोटोकॉल 02:03 "हम डार्विनवाद पूरी तरह चलाने लिए व्यवस्था बनाने में सफलता हासिल करेंगे ।"

प्रोटोकॉल 17:02 धर्मग्रंथों और बाइबिल पर हमले "हिन्दु धर्म, ईसाई धर्म सहित अनेक धर्म का पूरी तरह सफाया । रॉकेफिलर्स फन्डेड  सबसे कुख्यात इसाई धर्मगुरुओं द्वारा सेमिनार में गोस्पेल पर सवाल उठायाजाता है । बाइबल गॉड द्वारा लिखी गयी थी या नही, मेरी वर्जीन थी या नही, वर्जीन थी तो बच्चा किधर से आया, १९ विं सदी से ये सब शुरु हो गया था ।  और भारत में तो बुध्ध से पहले के समय से चल रहा था । नये नये नास्तिक पैदा होते थे लेकिन सब से पहला नास्तिक बुध्ध सफल हो पाया था सनातन धर्म को तोडने में । तब से आज तक तो हजारों आ गये हैं अपनी अपनी दुकाने ले कर ।

रॉकेफिलर्स का एक प्यादा धर्मगुरु फोस्डीक था, उसने इसाई धर्म में मोडर्निजम चलाया था । उस के धर्मोपदेश से जनता में आक्रोश फूट पड़ा था । इस्तीफा दे कर भागना पडा था । थोडे समय बाद रॉकेफिलर्स ने दुसरी जगहनदी के किनारे के चर्च के पादरी के रूप में काम पर रखा था और $ 4,000,000 खर्ख कर के फोस्डिक के प्रवचन की किताब की 130,000 प्रतियां मुद्रित कर के मंत्रियों और जनता में वितरित कर दी थी । फोस्डिक का भाई रेमंड रॉकफेलर फाउंडेशन का अध्यक्ष था । ब्रिग्स और फोस्डिक जैसे धर्मशास्त्रियों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों में इसा मसीह की दिव्यता, चमत्कार और जी उठने की बात का नकार शामिल थे जीसे मोडर्निजम कहते हैं । ईसाई धर्म के प्रमुख सिद्धांतों का पूरा परित्याग था । रॉकफेलर का धन कोन्वेन्ट और चर्चों में रिस चुका है । अब तो आधुनिकता बहुत आगे बढ गयी है, शैतान के द्वार खटखटाने लगी है । धर्म विरोधी फिल्में, डोक्युमेन्टरी टीवी शो और हजारों देश विदेश के युवा और बुढे नास्तिक ब्लोगरों को सोसियल मिडिया में लगा दिए हैं जो अपने अपने देश के धर्मों की वाट लगा रहे हैं ।

 ब्लू बीम प्रोजेक्ट १९८३ में युनो और नासा के सहयोग से बना था, शायद "स्टारवोर्स" के नाम एक योजना पसिध्ध हुई थी वोही हो सकता है । मूल प्रोजेक्ट १८ साल बाद लिक हुआ था उस के बाद आज तक कोइ अपडेट नही । अब तो उन लोगों ने नयी तकनिक, स्पेस हार्डवेर और सोफ्टवेर की नयी नयी खोज के बाद काफी सुधार कर लिया होगा । 

तो, संयुक्त राष्ट्र आज नए युग का जो आंदोलन चला रहा है उन लक्ष्यों को कार्यान्वित करने के लिए नया "मसीहा" पैदा करना है । 

नई विश्व व्यवस्था के उपकरण हैं, 
1 एक अंतरराष्ट्रीय सेना,  
2 एक अंतरराष्ट्रीय पुलिस बल,
3 अर्थव्यवस्था के लिए विश्व बैंक,
4 संयुक्त राष्ट्र के तहत एक विश्व सरकार,
5 दुनिया भर के जंगल के संरक्षण के लिए एक वर्ल्ड कन्जर्वेटरी बैंक,  
6 सभी धर्मो को हटाता एक विश्व धर्म, 
7 मानव गुलामों का काम करने की क्षमता पर आधारित सात जातियों में वर्गीकरण होगा, चाहे सहमत हो या ना हो ।
8 जो नयी सिस्टम को नही मानेगा उस सभी को मरने तक संयुक्तराष्ट्र के कोन्सेन्ट्रेशन कॅम्पों में डाल दिया जायेगा ।9 "ध वर्ल्ड अग्रिकल्चर एन्ड फूड सप्लाय" दुनिया भर के खाद्य और विटामिन की आपूर्ति को नियंत्रित करेंगे ।

नई विश्व व्यवस्था( न्यु ववर्ल्ड ऑर्डर) की क्या योजनाएं हैं ?

 वे मुर्तिपूजक, ग्रंथों और बाइबल में विश्वास करते हैं, अपने भगवान, गॉड या अल्ला की पूजा करनेवाले सभी समुदायों का खातमा करना चाहते हैं । धर्म से दूर करते कानून का उपयोग किया जायेगा । ग्रंथों को, धार्मिक सिम्बोल को, मुर्तियों को बार बर अपमानित किया जायेगाऔर उन पर बॅन लगाने की भूमिका बनायी जाएगी । अंग्रेजीकेलेन्डर से इसा पूर्व और इसवी सन के बदले कोमन एरा आ गया है, इ.पू २२५ को २२५ बी.सी.ई ( बिफोर कोमन एरा ) कहा जाने लगा है और इ.स. २०१४ को २०१४ सी.ई. (कोमन एरा) कहा जाता है । धार्मिक छुट्टियोंऔर त्योहारों के बदले नयी छुट्टियां और त्योहार आ जायेन्गे । युरोप में खूले में सेक्स आधारित त्यौहार मनाने की शुरुआत हो चुकी है । भारत में वेलेन्टाईन डे से शुरुआत हो गयी है ।

   नई विश्व व्यवस्था में सभी राष्ट्रीय मुद्राओं (करंसी) को मिटा कर एकइलेक्ट्रॉनिक कैश करंसी से सारे आर्थिक व्यावहारों को चलाया जाएगा । 

जो नई विश्व व्यवस्था को स्वीकार नहीं करेगा उन लोगों के लिए, नई विश्व व्यवस्था ने पहले से ही कोन्सन्ट्रेशन शिविरों का निर्माण किया है / कर रहे हैं 'रेनबो क्लासीफिकेशन' ओफ न्यु वर्ल्ड ऑर्डर प्रिजनर्स के नाम से । इंद्रधनुष (रेनबो) नई विश्व व्यवस्था के पैशाचिक साम्राज्य के प्रमुख के लिए ' पुल ' के रूप में माना जाता है । उदाहरण के लिए इस पूल को पार कर नयी दुनिया में जाना हो तो दैत्य ल्युसिफर की शपथ लेनी होगी ।

सभी कैदियों को शिक्षा के रूप में शैतान धर्म की दिक्षा दी जायेगी । आदमी जीन बाबतों को नही मानेगा उन बाबतों के आधार पर विरोध करने वाले सभी को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जायेगा । वर्गीकरण के अनुरूप कैदी को अलग अलग जगह पर भेजा जाएगा ।

1 धार्मिक बच्चों का वर्गीकरण , योजना के अनुसार , शैतान की पूजा के बडे समारोह के भीतर मानव बली के लिए , यौन ओर्गेनाजेशन में गुलाम यौन कर्मि बना कर किसी भी प्रकार के कार्य में भाग लेने के लिए मजबूर किया जाएगा ।

2 कैदियों के एक वर्ग दवाओं और नई प्रौद्योगिकियों का परीक्षण करने में काम आएगा, चिकित्सा प्रयोगों में काम आएगा । 

3  स्वस्थ कैदियों का वर्गीकरण, कैदी आंतर्राष्ट्रीय अंग दान केंद्र के काम आएन्गे । उन का एक एक अंग निकाल कर अन्यों के लिए उपयोग किया जायेगा और उन को तबतक यांत्रिक उपकरणों से जीवित रखा जाएगा जबतक सभी काम के अंग शैतान के डॉक्टर निकाल नही लेते । 

4 सभी स्वस्थ भूमिगत मजदूरों का वर्गीकरण । नई विश्व व्यवस्था मूल रूप से शैतान ल्युसिफर धर्म पर आधारित एक विश्वव्यापी तानाशाही है ; लोकतंत्र के भ्रम के साथ एक तानाशाही। हम जो इसे लिख रहे हैं उसी दौरान लोकतंत्र का भ्रम बनाए रखने के लिए , मजदूर कॅम्पस और मजदूरों को छुपाने के लिए बड़े पैमाने पर भूमिगत कालोनियां बन रही होगी ।

5 अनिश्चित कैदियों का वर्गीकरण, राजनीतिक और धार्मिक कैदियों को फिर से शिक्षित किया जाएगा ( कौन सा भी तरिका अपनाया जाएगा ) । बंदा अंतरराष्ट्रीय टेलीविजन कार्यक्रमों पर पश्चाताप और विश्व मानवता की महिमा और विश्व सरकार के गुणगान करने लगेगा ।

6 ये वर्गीकरण काफी स्पष्ट है, इन्टरनेशनल एक्जिक्युशन सेन्टर में भेजने लायक । 

7  वर्गीकरण सात, हम अभी सातवें वर्गीकरण के विवरण पर इंतजार कर रहे हैं, और उस बात का भी इन्तजार है कि इन वर्गिकृत कैदियों को कौन से रंग एलोट किए जानेवाले हैं । भविष्य का "स्वर्ग" बनाने के लिए नासा की ब्लू बीम योजना दुनिया की तमाम सभ्यता और धर्मो को तोडता हुआ कितनी तबाही करने बाला है कोइ नही जानता ।   

प्रोजेक्ट ब्लू बीम
कुख्यात नासा की ब्लू बीम परियोजना नए युग के शैतान धर्म को लागू करने के लिए चार अलग अलग चरण में हैं ।  याद रहे न्यु एज धर्म के बीना नई विश्व व्यवस्था की तानाशाही पूरी तरह से असंभव है ।  दोहराता हूँ: नए युग धर्म में एक सार्वभौमिक धारणा के बिना, नई विश्व व्यवस्था की सफलता असंभव हो जाएगा! इसलिए तो ब्लू बीम परियोजना उनके लिए इतना महत्वपूर्ण है, लेकिन अच्छी तरह से अब तक छुपा के रख्खा है । ब्लू बीम टेक्नोलोजी के कारण थोडा अलग है वरना उन दानवओं के हर प्रोग्राम में एजन्डे समान ही है ।

नासा ब्लू बीम परियोजना का पहला चरण

सभी पुरातात्विक ज्ञान को उलट पूलट कर दो । सेटेलाईट फोटो, खास जगह पर कृत्रिम भूकंप, नयी नयी नकली पुरातात्विक साईट्स से समजाया जायेगा कि आप के धार्मिक सिध्धांतों में भूल है । अबतक जो मानते थे वो बात नही थी बात यही थी जो अब सामने आयी है । पहला कदम के लिए मनोवैज्ञानिक तैयारी के लिए पहले से ही फिल्में बनी हैं, ए स्पेस ओडिसी , ' स्टारट्रेक श्रृंखला, और 'इन्डिपेन्डन्ट डे', अंतरिक्ष से हमले और उस से निपटने के लिए सभी देशों का एक साथ हो जाना,  एक फिल्म बनी थी जो डार्विन के विकास के सिद्धांत के साथ बनी थी 'जुरासीस पार्क, जीस में भगवान को नकार दिया है ।
 
जहां पर नकली दबा सत्य दबा है, उस अनजान जगहों से नयी (कृत्रिम मोडेल्स से बनी नकली ) चिजों को खोद निकाल ने के लिए रिडिस्कवरी के नाटक किए जायेन्गे और नये सत्य को खोज निकालेन्गे और धार्मिक मान्यताओं को बदला जाएगा। ऐसे सबूत बताएन्गे जो सभी मूल धर्मों के आधार को ही मिटा देन्गे ।   

नासा ब्लू बीम परियोजना का दूसरा चरण

दूसरे चरण में विशाल थ्री डायमेन्शनल ऑप्टिकल होलोग्राम, आवाज, लेसर प्रोजेक्शन द्वारा दुनिया की अलग अलग जगह की मल्टिपल होलोग्राफिज तस्विरों में 'अंतरिक्ष शो' दिखाना, जीस में विभिन्न भागों में, प्रत्येक क्षेत्रीय, राष्ट्रीय धार्मिक आस्था के विपरित तस्विर बताई जायेगी ।

ऑडियो विज्युअल के माध्यम से उन के शैतान गॉड की सभी भाषाओं में आकाशवाणी होगी  । इसे समजने के लिए पिछले 25 वर्षों में किये गये उन की विभिन्न गुप्त सेवाओं के अनुसंधान का अध्ययन करना चाहिए।सोवियत ने तो एक सुपर कोम्प्युटर बना लिया है और निर्यात भी कर रहा है, जो शरीर रचना और मानव शरीर की विद्युत संरचना, बिजली, रासायनिक और जैविक गुणों का अध्ययन, उस अध्ययन के आधार पर फिजियो-सायकोलोजिकल विवरण के साथ एक मिनिट में मानव मस्तिष्क तक पहुंचाता है ।

उन कोम्प्युटरों में सभी भाषाएं, सभी मानव संस्कृतियां उन के अर्थों को फिड किया हुआ है । नये मसिहा, उस के उद्देश्य और कार्यक्रमों को फिड किया जा रहा है । कोइ  नई विश्व व्यवस्था की बातों का पालन नहीं करता हो तो आत्महत्या के विचारों को प्रेरित करने के लिए हर व्यक्ति, हर समाज और संस्कृति के लिए इलेक्ट्रॉनिक वेवलेन्ग्थ के आवंटन द्वारा आत्महत्या के तरीकों का सहारा लिया जाएगा ।

स्पेस शो कहां से आयेगा ? ये लगभग 60 मील की दूरी पर रहे पृथ्वी की सोडियम परत पर उपग्रह द्वारा प्रक्षेपित किया जाएगा । हम उन के टेस्ट देख सकते हैं लेकिन उसे 'युफो' या 'उडन तश्तरी' नाम दे दिया जाता है । आकाश को एक सिनेमा के पर्दे की तरह उपयोग किया जायेगा ।

नासा ब्लू बीम परियोजना का तिसरा चरण
तीसरे चरण को टेलिपॅथिक इलेक्ट्रॉनिक टू-वे कोम्युनिकेशन कहा जाता है । लेफ्टिनेंट कर्नल अलेक्जेंडर : 'उपग्रह के माध्यम से कृत्रिम सोच को मल्टिजेनिक फिल्ड में फिड करना संभव है और इस से और पूरे ग्रह के मानव मन पर नियंत्रण करना संभव है । एक व्यक्ति के विचार लगातार सवाल बनते जाएन्गे, वो अपने ही वैचारिक, धार्मिक और नैतिक सिमाओं से बाहर करनेवाले विचारों पर कार्रवाई नहीं कर पाएगा ।' 
एक बार फिर समजना होगा यह टेलीविजन, विज्ञापन, आधुनिक शिक्षा और सामाजिक दबाव के विभिन्न प्रकार, उन सीमाओं में हेरफेर करने के लिए उपयोग किया जाता है ।

नासा ब्लू बीम परियोजना का चौथा चरण
चौथे चरण इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से वैश्विक अलौकिक अभिव्यक्ति के लिए है । 
 मानव जाति के मन में बात बैठा दो कि परग्रहवासी है और वो समय समय पर आक्रमण करते हैं । हमारी पूरानी सभ्यताओं का विनाश इन परग्रहवासी एलियनो के कारण हुआ था । हमारे शहरों पर कभी भी हमला कर सकते हैं । उन से बचने के उपाय में भारी बंदोबस्त करना होगा तो दुनिया के देशों को एकजुट हो कर साथ खडे रहना होगा ।
 इलेक्ट्रॉनिक और अलौकिक ताकतों का एक मिश्रण है तो तरंगों को "अलौकिक ताकत" का आभास बना कर ऑप्टिकल फाइबर, केबल (टीवी), बिजली और फोन लाइन के माध्यम से यात्रा करने की अनुमति देगा। एंबेडेड चिप्स पहले से ही सभी जगह में फिट होगा। लक्ष होगा वैश्विक सैटेनिक भूत को एक साथ सभी जगह दिखा कर दुनिया की जनता में भय, उन्माद और पागलपन, आत्महत्या, हत्या और स्थायी मनोविकारों की एक लहर पैदा करना ।

इस तरह की ' नाईट ओफ थाउजन्ड स्टार्स ' के बाद दुनियाभर की आबादी अपनी स्वतंत्रता की किमत पर भी शांति और फिर से स्थापित व्यवस्था के लिए नये मसिहा की शरणागति के लिए तैयार हो जाएन्गे । 
 हमें प्राप्त हुए कई रिपोर्ट्स के अनुसार, और हमे भी विश्वास है कि दुनिया भर में आर्थिक संकट खडा किया जाएगा और जगत के आर्थिक जगत को पूर्ण दुर्घटनाग्रस्त किया जाएगा । एकदम बरबाद नही पर उतना घायल कि उस के बचाव में दुनिया भर की कागज या प्लास्टिक मनी को इलेक्ट्रॉनिक नकदी नें बदल ने का मौका मिल जाए । भारत सहित देश विदेश में इन शैतानो के साथी इस नयी शैतान नी मुद्रा की वकालत करने में लग गये हैं ।

पेपर करंसी को मिटाना एक ही कारण है, दुनिया भर की जनता को आर्थिक रूप से गुलाम बनाना । आदमी अपने खून पसीनो से कमाया हुआ धन अमानत के रूप में शैतानो के पास रखने को विवश होगा, खूनी भेडियों के मुह में हिफाजत के लिए अपनी ही गरदन रख ने जैसा है । किसी को भी धन से बेदखल कर देना एक माउस क्लीक या एक कीबोर्ड का डिलेट बटन ही काफी होगा। मानव का अस्तित्व ही शैतानो की दया पर होगा ।दानवों का विद्रोह कर रहे विद्रोहियों के लिए कोइ फंडिन्ग नही कर पाएगा।

किसी भी तरह की स्वतंत्रता को रोकने के लिए मानवप्राणी में माइक्रोचीप लगाना चाहते हैं । क्यों कि मानव इधर उधर कहीं भागता ना रहे, सेटेलाईट के उस का पिछा किया जा सके, वो क्या करता है, किसे मिलता है वो जाना जा सकता है। 

 नई विश्व व्यवस्था पहले से ही एक खाद्य और विटामिन की आपूर्ति पर हर किसी को शैतानो पर निर्भर बनाने के लिए सभी देशों के कानून बदलवा रहे है । भारत को टार्गेट करने के लिए शैतान के साथी आमर्त्यसेन का बनाया और दानव के प्यादे सोनिया-मनमोहन का पारित खाद्य सुरक्षा बील एक अच्छा उदाहरण है । 

वे ऐसे धर्मों के लिए खास कानून बनाते हैं जो धर्म संभवतः NWO के विरोध करने में सक्षम हो। भारत में हिन्दुओं के लिए अलग से कानून बनते हैं जो हिन्दुओं को ही नूकसान के लिए बनते हैं । 
 एक तानाशाही विश्वसरकार का लक्ष्य है इस ग्रह पर हर जगह, हर किसी को बेरहमी से और बिना किसी अपवाद के साथ नियंत्रित करना है ।
इस लिए तो जनता को कंट्रोल करने की, हर जगह नयी नयी टेक्नोलोजी उपयोग में लाई जा रही है । १९४० और १९५० की टेक्नोलोजी जनता की उन्नति और जीवन को आसान बनाने के लिए थी। नयी टेक्नोलोजी सभी जगह जनता को कंट्रोल और ट्रेक करने के लिए डिजाईन हो रही है । इस तकनीक को एक विशेष उद्देश्य के लिएनिर्मित किया है और इस से दुनिया की पूरी आबादी को वश में रखना है ।  
आप इसे नहीं देख सकते हैं, आप इसे नही समज सकते हैं,  तो आप और आपके परिवार और दोस्तों के लिए हर राज्य, हर शहर के स्मशान में रहे अग्नी का शिकार होना तय है। इस  अधिनायकवादी पुलिस राज्य में कोइ भी सुरक्षित नही है!

Thursday, June 5, 2014







स्नेही स्वजनों,स्वागत एवं सुमंग; संध्या~~~~~~~~~~~^~~~~~~~~~~~~~

ईसाई धर्मावलम्बी, हिन्दू देवी-देवताओं को, किन गंदी नज़रों से देखते हैं ?

किसी ने आपको सिखा दिया है कि 'बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो' 
और आपने उसे अपना 'कवच' जैसा बना लिया है
आप न बुरा देखते हैं, न बुरा सुनते हैं,न बुरा मानते हैं।

क्या कभी आपने सोचा है कि स्वाभिमान जैसी भी कोई चीज होती है ?

सिआटल (Seattle अमरीका) की एक कंपनी सिटिन प्रेटी (Sittin Pretty) कोमोड
(toilet seat) बेचनी शुरू की श्री गणेश एवं माँ काली की तस्वीरों के साथ।

अपने चहेते ईसा मसीह की तस्वीर उन्होंने वहाँ न दी।
पैगम्बर मुहम्मद की तस्वीर देने की बात सोच कर वे अपने ही पैंट में टट्टी कर देते,
हलाल कर दिये जाने के डर से।
यदि साधारण ईसाई दूध के धुले भलेमानुस थे,तो उन्हें इन टट्टी करने के स्थानों का
बहिष्कार करना चाहिये था,जो उन्होंने नहीं किया,बल्कि उन्हे बड़े चाव के साथ खरीदा
और उनको अपने घरों में लगाया,ताकि वे श्री गणेश व माँ काली के साथ हग सकें।

कई हिंदू संस्थाओं ने इस पर आपत्ति उठाई।
हजारों की संख्या मे ईमेल गए, फैक्स एवं टेलीफोन किए गए। कोशिशें ज़ारी रहीं।
काफी लम्बा चला यह आन्दोलन।
अंत में कंपनी ने इन डिज़ाइनों को बजार से वापस लेना स्वीकार किया।

उनकी नजर में हिन्दू धर्म एक नारकीय/राक्षसी धर्म है, असभ्य लोगों का धर्म है,
केवल ईसाई बनाकर हिंदुओं को सुसभ्य बनाया जा सकता है।

अमरीका के ईसाई धर्माध्यक्षों के परिवार में जन्मे डॉ डेविड फ़्रावले (वामदेव शास्त्री)
अपनी आत्मकथा स्वरूप पुस्तक में लिखते हैं -
"वे हमेशा धन माँगते हैं अमरीकी जनसमुदाय से कि हम भारतवर्ष में जाकर हिंदुओं
का धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं।

हम यह देखते हैं नित्य विभिन्न टेलिविज़न चैनेलों पर।
पैट रॉबर्टसन जो उनके मुख्य धार्मिक नेताओं में से एक हैं उन्होंने कहा है कि हिंदू धर्म
एक नारकीय/राक्षसी धर्म है ।
वे हिंदू देवताओं को जानवरों के सिरों के साथ दिखाते हैं और कहते हैं जरा देखो इन्हें
कितने असभ्य हैं ये लोग।
वे भारतवर्ष के राज नैतिक एवं सामाजिक समस्याओं को अमरीकी जन समुदाय के
समक्ष रख कर कहते हैं यह सब हिंदू धर्म के कारण हैं।
वे अमरीकी जन समुदाय से कहते हैं कि हमें धन दीजिए ताकि हम भारतवर्ष जाकर
उन्हें इस भयावह हिंदू धर्म के चंगुल से छुड़ाएँ और उन्हें ईसाई बना सकें।"

पश्चिमी देशों में लाखों-करोड़ों व्यक्ति, हिंदूधर्म के बारे में, इन धारणाओं के साथ
जीते हैं

आप अमरीका में रहते होंगे,पर सैकड़ों में से उन्हीं पाँच-सात चैनलों को देखते होंगे
जिनमें आपकी रुचि है।

अतः आप न तो बुरा देखते हैं,न बुरा सुनते हैं,न आपको बुरा लगता है।

पर अमरीका और कैनेडा में ऐसे लाखों गोरी चमड़ी वाले होंगे जो उन चैनलों को देखते
हैं और हिंदुओं के बारे में ऐसी-ही धारणाओं के साथ जीते हैं।
आप भारतवर्ष में रहते हैं,आपको वे अमरीकी चैनल देखने को मिलते नहीं।

आप न बुरा देखते हैं, न बुरा सुनते हैं, न बुरा मानते हैं।

अधिकांशतः हिंदू धर्मगुरू इन समस्यायों के प्रति जागरूक नहीं हैं और इसकी 'तोड़'
के बारे में प्रयत्नशील नहीं दिखायी देते हैं

अमरीका में आप अपने गुरु के पास जाते हैं,उनका अपना एक सम्प्रदाय जैसा होता है।
वहाँ पाँच-सौ हिंदुओं में दो-तीन गोरी चमड़ी वाले भी होते हैं।
अनुयायी उनके पाँव छूते हैं,उनका पंथ अपने पर फैला रहा होता है।
आप भी खुश,आप के गुरू भी खुश।

किसी को क्या पड़ी है कि सार्वजनिक रूप से विरोध करें कि हिन्दू धर्म का अपमान
हम नहीं सह सकते।

किसी ने आपको सिखा दिया है कि 'बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो' और
आपने उसे अपना 'कवच' जैसा बना लिया है

आप भारतवर्ष में रहते हैं, अपनी पसन्द की दो-चार चैनलों को देखते हैं।
उन चैनलों को आप देखते नहीं जिनमें हिन्दूओं के विरुद्ध उट-पटांग बातें दिखायी जाती हैं।
इस प्रकार आप न बुरा देखते हैं,न बुरा सुनते हैं,न बुरा मानते हैं।

वे मुट्ठीभर जो आपको लगातार सचेत किये रखना चाहते हैं,उनसे आपको 'परहेज' है।

ऐसी पत्र-पत्रिकायें जो आपको हिन्दू धर्म के विरुद्ध हो रहे अभियानों के बारे में सचेत
करते रहते हैं उन्हें आप पढ़ना नहीं चाहते क्योंकि आपकी दृष्टि में वे सब उग्रवादी हैं, साम्प्रदायिक हैं,धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं।
(उदाहरण के लिए 'हिन्दू वॉइस' एवं 'सनातन प्रभात')।

स्वाभिमान को तजकर आप उदार बनने की चेष्टा में लगे हैं

आपकी सोच कुछ ऐसी बन चुकी है कि यदि कोई आपको कहता है कि 'मेरे भाई,तुमने
तो मुझे केवल एक थप्पड़ मारा है,एक और मार दो' तो आप उसे महान आत्मा घोषित
कर देंगे।
मानसिक नपुंसकता की महिमा आपके दिलो-दिमाग पर इस तरह छा चुकी है कि
स्वाभिमान जैसा शब्द आपके शब्दकोश से कोसों दूर जा चुका है।

क्षात्रधर्म तो आप भुला बैठे और गीता को जाने क्या समझ लिया है

क्षात्रधर्म तो आपने भुला दिया है क्योंकि आपके दिग्दर्शकों ने आपको समझाया कि
भगवद्गीता आपको त्याग का सन्देश देती है,आपको अन्तर्मुखी बन कर ईश्वर की
साधना में लीन होने को कहती है।

महाभारत तो एक पारिवारिक कलह एवं अनावश्यक रक्तपात की कहानी है,
अतः उसमें सीख लेने जैसी कोई बात नहीं है।

कोई आपसे यह नहीं कहता कि भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र
की रणभूमि में ही क्यों दिया,त्याग और ईश्वर प्राप्ति की बातें करनी थीं तो अर्जुन को
लेकर किसी वन में क्यों न चले गए?

भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि एक समय आयेगा जब मानव-जीवन अपने आप में एक
रणक्षेत्र बन जायेगा और आज हम उसी स्थिति में पहुँच गए हैं।
आज गीता के संदेश को एक बार फिर से समझने की आवश्यकता है,और वह भी एक नई
दृष्टि से।

उन विधर्मियों के शब्दों में अमरनाथ की यात्रा का उद्देश्य है विनाश के देवता शिव के
कामवासना के अंगों की पूजा !!

डॉ डेविड फ़्रावले (वामदेव शास्त्री) लिखते हैं -

"न्यूयॉर्क टाइम्स अमरनाथ की तीर्थयात्रा के बारे में लिखता है कि हिंदू जा रहे हैं विनाश
के देवता शिव के कामवासना के अंगों की पूजा के लिए।"

न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे ख्याति प्राप्त समचार पत्र,जो अमरीकी जनमत तैयार करते हैं

न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे ख्याति प्राप्त समचार पत्र, जो अमरीकी जनमत तैयार करते हैं,
वे अपने पाठकों को बताते हैं शिव हैं विनाश के देवता और उनके कामवासना के अंगों
की पूजा है अमरनाथ तीर्थ यात्रा का मुख्य उद्देश्य।

जरा सोच कर देखिए क्या प्रभाव पड़ता होगा विश्व जनमत पर हिंदू धर्म के बारे में।

कब तक इस भ्रम में जीयेंगे कि हिंदू धर्म की क्या साख है सारे विश्व में

आप में से अनेक हैं जो फूले नहीं समाते जब देखते हैं मुट्ठी भर गोरी चमड़ी वालों को हिंदू
धर्म अपनाते।

आप इसी खुशफ़हमी में जीते हैं कि देखो हिंदू धर्म की क्या साख है सारे विश्व में,
जो इन गोरी चमड़ी वालों को भी प्रेरित करती है हिंदू धर्म को अपनाने।

कुछ तो यहाँ तक छाप देते हैं कि आज सारा विश्व हिंदू धर्म की महत्ता को मानता है
पर हमारे अपने हिंदू उस महत्ता को नहीं समझते।

ये अति ज्ञानी लोग उन मुट्ठी भर गोरी चमड़ी वालों को सारे विश्व का प्रतिनिधि मान
बैठते हैं।

क्या ऐसा नहीं लगता कि आप अपनी ही नज़रों में इतना गिर चुके हैं कि कोई जरा सा
आपकी पीठ थपथपाता और आप फूल कर कुप्पा बन जाते हैं।

आपने खो दी अपनी शिक्षा, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान !!

यही तो चाहा था उस टीबी मॅकॉले ने जो 'टी-बी' की तरह घुन लगा गया हमारे स्वाभिमान
को,जब वह लेकर आया ईसाई मिशनरियों की बटालियन सन 1835 में, हमें ईसाई-अँग्रेज़ी
शिक्षा पद्धति के साँचे में ढालने के उद्देश्य से।

वह तो सफल हो गया अपने उद्देश्य में और उसका मूल्य चुकाया आपने।
आपने खो दी अपनी शिक्षा, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान।

उन विधर्मियों के शब्दों में शिव नशे में धुत्त गाँव-गाँव में नंगा घूमता है,शिव मंदिरों में
पाओगे एक खड़ा जननांग जो है शिव की निरंकुश कामुकता का प्रतीक,
शिव की पत्नि 'शक्ति' मद्यपान,व्यभिचार,लाम्पट्य,मंदिरों में वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहित
करती है,
'काली' दुष्ट, डरावनी, ख़ून की प्यासी है।

क्या ये रक्तबीज जैसे किसी असुर की ही संतानें हैं?

माँ काली ने रक्तबीज नामक असुर का संहार किया था,जिसके खून का एक कतरा धरती
पर गिरने से एक और वैसा ही असुर पैदा हो जाता था।

अतः स्वाभविक है कि कोई भी ऐसा असुर माँ काली को श्रद्धा की दृष्टि से नहीं देखेगा।

ईसाई भी माँ काली को श्रद्धा की दृष्टि से नहीं देखते।

क्या इसका मतलब यह हुआ कि ये ईसाई भी उसी रक्तबीज जैसे किसी असुर की ही
संतानें हैं?

प्रतिदिन पैंतीस हज़ार लोगों के मन में हिंदू धर्म के प्रति कैसा विष बोया जाता है

आज इंटरनेट का बोलबाला है।
विश्व के कोने कोने तक अपनी बात पहुँचाने का यह सबसे सस्ता एवं द्रुतगामी माध्यम है।
वेब साइट पर एक काउंटर होता है।
यह काउंटर गिनता रहता है कितने लोग अब तक इस साइट पर आए हैं।
जब भी कोई व्यक्ति विश्व के किसी भी कोने से कंप्यूटर के द्वारा उस साइट पर जाता है
तो तत्काल काउंटर उसे रेकॉर्ड कर लेता है।
डॉ जेरोमे का दावा है कि इस साइट को विश्व भर से पैंतीस हज़ार लोग प्रतिदिन देखते हैं।
अब सुनिए उनकी जबानी हिंदू धर्म की कहानी।
http://religion-cults.com/Eastern/Hinduism/hindu11.htm

भगवान शिव एवं माँ शक्ति की आज यह छवि प्रस्तुत की जाती है !!

"हिन्दू धर्म है जमघट विभिन्न पंथों का जिसे कहा जा सकता है धार्मिक अराजकता का
ज्वलंत उदाहरण।
शिव उनमें से सबसे अधिक लोकप्रिय है।
उसके सबसे अधिक भक्त मिलेंगे आपको।
नटराज के रूप में वह चार हाथों के साथ नाचता है।
चारों ओर नंगा घूमता है गाँव गाँव में,नंदी नामक एक सफ़ेद साँड़ के पीठ पर चढ़ कर।
नशे में धुत्त, भूखे रहने और अपने शरीर को विकृत करने की शिक्षा देता वह।
भैरव के रूप में अपने पिता की हत्या करने वाला,अपने बाप की खोपड़ी को एक कटोरे के
रूप में प्रयोग करने वाला है वह।
अर्धनारीश्वर के रूप में स्त्री व पुरुष के काम वासना की छवि है वह।
उसके मंदिरों में सदा पाओगे एक बड़ा लिंगपुरुष,रूढ़ शैली का एक खड़ा जननांग जो है
शिव की निरंकुश कामुकता का प्रतीक है।
(Erect Penis symbolizing his rampant Sexuality)

शिव की पत्नियाँ बड़ी लोकप्रिय हैं।
शक्ति रहस्यानुष्ठान,मद्यपान-उत्सव,व्यभिचार,लाम्पट्य,मंदिरों में वेश्यावृत्ति एवं
बलि देने की प्रथा को प्रोत्साहित करती है।
शक्ति ने आरम्भ किया सती प्रथा का जिसमें विधवा आग में कूद जाती है अपने पति
की चिता में।

शक्ति काली के रूप में दुष्ट, डरावनी और ख़ून की प्यासी और सबसे अधिक लोकप्रिय है।
वह खड़ी होती है एक छिन्न-मस्तक शरीर के ऊपर,गले में मनुष्यों के कटे सरों की माला
डाले।
ख़बरों के अनुसार प्रति वर्ष सौ व्यक्तियों का ख़ून किया जाता है,बलि के लिए,भारतवर्ष
में काली के सम्मान में।

हिंदू धर्म के जंगल में न घुसो, निकल भागो इस जंगल से जब यह तुम्हारे बस में हो।"http://religion-cults.com/Eastern/Hinduism/hindu11.htm''

उस ईसाई धर्माध्यक्ष ने क्या सोच कर अपने अंग्रेजी मूल में erect penis शब्द का
'चयन' किया, genital का क्यों नहीं ?

आप स्वयं सोच कर देखें कि इस ईसाई धर्माध्यक्ष ने genital (जननेन्द्रिय) शब्द का
प्रयोग नहीं किया।
उसने erect (खड़ा, तना हुआ) विशेषण का प्रयोग किया है genital के साथ नहीं बल्कि
penis के साथ।
जब penis erect होता है तब पुरुष के मन में कामुकता की भावना प्रबल होती है।
इसी बात पर जोर देते हुए ईसाई धर्माध्यक्ष हमारे भगवान शिव की rampant (निरंकुश) sexuality (कामुकता) का वर्णन करते हुए उन्हें काम वासना की छवि बताया।
अतः erect penis की बात करते हुए उनकी भावना स्पष्टतः कामुकता से उद्वेलित खड़े
जननांग की ओर संकेत करती है,किसी जननेन्द्रिय (सृजन प्रक्रिया का एक अंग) अथवा
किसी लिंग (gender जैसे स्त्रीलिंग या पुलिंग) की नहीं।

दो हिंदू संस्थाओं के द्वारा किये गए घोर आपत्ति के बावज़ूद उस ईसाई धर्म गुरु ने अपने वेबसाइट पर कोई भी परिवर्तन करना स्वीकार नहीं किया

भगवान शिव ने कामुकता पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली थी।
उसी भगवान शिव के बारे में,अश्लील भावना का प्रदर्शन करते हुए,उस प्रख्यात ईसाई
धर्माध्यक्ष ने अपने शब्दों का चयन किया था बहुत ही सोच-समझ कर।
अमरीका में दो हिंदू संस्थाओं ने घोर आपत्ति की,भगवान शिव के लिए erect penis एवं rampant sexuality जैसे शब्दों के प्रयोग पर।
पर उस ईसाई धर्म गुरु ने अपने वेबसाइट पर कोई भी परिवर्तन करना स्वीकार नहीं किया।
ऐसा क्यों?
विवरण - http://www.IndiaCause.com/

अब तक एक करोड़ लोग देख चुके होंगे उस वेबसाइट को - क्या प्रभाव पड़ता होगा सारे
विश्व पर हिंदू धर्म के प्रति?

हिंदू धर्म के प्रति अपनी वह कुत्सित भावना,उस ईसाई धर्माध्यक्ष ने,विश्व भर के लाखों
लोगों के मन में भरी।

क्या प्रभाव पड़ता होगा सारे विश्व पर जब पैंतीस हज़ार लोग प्रतिदिन पढ़ते होंगे इसको?
आपके सामने आपके धर्म का बलात्कार हो रहा है और आपकी आत्मा को यह स्वीकार भी है

यह सब जानकर भी यदि आपका खून नहीं खौलता तो जान लीजिए कि आप का खून
ठंडा पड़ चुका है और आप स्वाभिमान के साथ जीने के हकदार नहीं हैं।

जरा सोचकर देखिए जैसे आपकी माँ अपने दूध से आपके शरीर को सींचती है ठीक
उसी प्रकार आपका धर्म आपकी आत्मा को सींचता है।
कल्पना कीजिए, आपके सामने आपकी माँ का बलात्कार हो रहा है।
उसी प्रकार आज आपके धर्म का बलात्कार हो रहा है।
आपकी आत्मा को यह स्वीकार भी है।

आपकी सोच - हमारा हिंदू धर्म विश्व भर में कितने आदर के साथ देखा जाता है

और आप हैं कि मुट्ठी भर सफेद चमड़ी वालों को हिंदू धर्म अपनाते देख,फूले नहीं समाते।
यह सोच कर खुश हो लेते हैं कि हमारा हिंदू धर्म विश्व भर में कितने आदर के साथ देखा
जाता है।

अब तो कम से कम अपने मन को बहलाना बंद कीजिए।

ईसाई ऐसा क्यों करते है ? क्या छुपा है उनकी शिक्षा एवं उनके चरित्र में ?

मैं स्वयं अनगिनत बार भगवान शिव शंकर के द्वार पर गया पर मुझे तो वहाँ कभी वह न
दिखा जो ईसाइयोंको दिखा।
मेरे मन में वैसी भावना कभी जगी तक नहीं।
उस भावना के अस्तित्व को मैंने तभी जाना जब उसके बारे में पुस्तकों में पढ़ा या दूसरों
से सुना और फिर भी मेरे मन में वह भावना कभी घर न कर पायी।
ऐसा क्या है उन ईसाइयों की सोच में जो उन्हें सदा खड़ा लंड ही दिखाई देता है ?
आगे चलकर इसी रहस्य को समझने की चेष्टा करेंगे।

यह समझने की भूल न करें कि ये सारे हथकण्डे केवल ईसाई धर्मगुरुओं और चंद कलाकारों
के ही हैं - बाकी साधारण ईसाई दूध के धुले हुए हैं.

अमेरीकन ईगल आउटफिटर्स (American Eagle Outfitters) नामक कम्पनी ने देवी
देवताओं के चित्र वाले चप्पलों को 12.50 डॉलर (500 रुपये उन दिनों) में बेचना शुरू किया
जिन पर हमारे पूजनीय श्री गणेश की मूर्ति अंकित थी।
इस कंपनी के लगभग 750 स्टोर्स मिलेंगे आपको, अमरीका एवं कैनेडा में।

यदि साधारण ईसाई दूध के धुले भलेमानुस थे,तो उन्हें इन चप्पलों का बहिष्कार करना
चाहिये था,जो उन्होंने नहीं किया, बल्कि उन्हे बड़े चाव के साथ खरीदा और पहना,
ताकि वे हमारे परम पूज्य श्री गणेश को अपने पैरों तले प्रतिदिन रौंद सकें।

अमरीका की IndiaCause नामक हिंदू संस्था ने इस पर आपत्ति करते हुए कम्पनी
को लिखा।
कम्पनी के वाइस-प्रेसिडेन्ट नील बुलमैन जूनियर ने क्षमायाचना करते हुए IndiaCause
को फैक्स भेजा इस आश्वासन के साथ कि वे उन सारी चप्पलों को अपनी दुकानों से
वापस मंगा लेंगे।
विवरण - www.indiacause.com
इस संस्था ने चेष्टा की। इस चेष्टा का फल भी मिला।

हमारे देश के धर्मान्तरित ईसाई तो विदेशियों से भी एक कदम आगे गाँव में जिस शिवलिंग
की नियमित पूजा होती थी उसी पर ये ईसाई टट्टी कर जाते हैं -
उस ईसाई धर्मगुरु की शह पर जिसने उनका धर्मान्तरण किया

ग्राम कोविलनचेरी जिला कांची प्रदेश तमिलनाडु - यह केवल अमरीका की बात ही नहीं,
हमारे अपने भारतवर्ष में भी ऐसा होता है पर आपकी समाचार एजेंसियाँ इन्हें आपसे
छुपा जाती हैं।
अंतर केवल इतना है कि यहाँ आज माँ काली की फ़ोटो के साथ नहीं,बल्कि उससे एक
कदम बढ़ कर,साक्षात शिवलिंग के ऊपर टट्टी करते हैं,उसे कोमोड मान कर।

वह शिवलिंग जिसकी,तब भी गाँव में, नियमित पूजा होती थी।
सम्पूर्ण विवरण - हिंदू वॉइस (अँग्रेजी संस्करण),
रिपोर्ट एस वी बादरी, सितम्बर 2003, पृ 40-41

कब तक आप सत्य से भागते फिरेंगे?

आपको सदा से सिखाया जाता रहा है कि अपने गरेबान में झाँक कर देखो
(अपने अंदर झाँक कर देखो)। और आपने भी सदा अपने ही गरेबान में झाँकना सीखा है।

इस प्रक्रिया में आपने इतनी महारथ हासिल कर ली है कि आप अपनी ही नज़रों में बहुत
छोटे बन गए हैं।
अपने हिंदुओं में ही सर्वदा दोष खोजने के आदी बन चुके हैं।

यह उन भगोड़ों की विशेषता है जो समस्या के समाधान हेतु 'समस्या को पैदा' करने वालों
के विरुद्ध खड़े होने का सत्साहस नहीं रखते।

क्या आपने कभी दूसरों के गरेबान में भी झाँक कर देखने की चेष्टा की है? इसलिए नहीं
कि आप उनकी गलतियाँ निकालें।

बल्कि इसलिए कि वे सदा से आपको छोटा दिखाते आये हैं। एक बार उनकी खामियों की
ओर भी नजर डाल कर देखें, केवल अपनों को हीन मानने के बजाय !

क्या कभी आपने सोचा है कि स्वाभिमान जैसी भी कोई चीज होती है ?

क्या आपने जाना है कि आत्मरक्षा का हमारी जीवन प्रक्रिया में कोई महत्व होता है ?
आत्मरक्षा की बात करें तो केवल यह न सोचिए--आपके शरीर पर हमला हो रहा है।

हमला आपकी आत्मा पर भी हो सकता है।
हमला आपकी आस्थाओं पर भी हो सकता है।
हमले का उद्देश्य आपकी सोच को एक नया जामा पहनाने का भी हो सकता है।
हमला एक षड़यंत्र के रूप में भी हो सकता है जिसके पीछे एक निहित स्वार्थ हो।

और वह यह कि आपको अपनी जड़ों से उखाड़ कर अलग करना। जब आप अपनी जड़ों
से ही कट जायेंगे तो आप अपनी पहचान को भी भूल जायेंगे।

क्या यही नहीं हो रहा है आज के युवा वर्ग के साथ ?

ऐसा क्या है ईसाइयों की सोच में,उनकी शिक्षा में, उनके संस्कारों में और उनके छुपे हुए
अतीत में,जो उन्हें इस रूप में ढालता है ?

क्या वे ऐसा केवल आज ही कर रहे हैं? नहीं, केवल आज ही नहीं,वे सदा से ही ऐसा करते
आए हैं।
वे सदा से ऐसा क्यों करते आए हैं ?
ऐसा क्या छुपा है उनके अतीत में ?
क्या हिंदू धर्म भी उनके साथ ऐसा ही व्यवहार करता है? कभी नहीं।
वे किस मिट्टी के बनें हैं जो उनमें इतनी घृणा है हमारे प्रति ?
--कट्टर हिंदू
========

जागो हिंदू जागो !!

जयति हिंदू सनातन संस्कृति,,,जयति पुण्य भूमि भारत,,
सदा सुमंगल,,वंदेमातरम,,,
जय श्री राम

Blog Archive

INTRODUCTION

My photo
INDIA-RUSSIA, India
Researcher of Yog-Tantra with the help of Mercury. Working since 1988 in this field.Have own library n a good collection of mysterious things. you can send me e-mail at alon291@yahoo.com Занимаюсь изучением Тантра,йоги с помощью Меркурий. В этой области работаю с 1988 года. За это время собрал внушительную библиотеку и коллекцию магических вещей. Всегда рад общению: alon291@yahoo.com